अर्जुनी मोरगांव के दीपेश जिवानी 5 साल बाद बरी, कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सुनाया फैसला

Gondia News: अर्जुनी मोरगांव के दीपेश जिवानी को गोंदिया सत्र न्यायालय ने फर्जी एट्रोसिटी मामले में बरी कर दिया है। 5 साल के लंबे संघर्ष के बाद पुख्ता सबूत न होने पर अदालत ने यह फैसला दिया।
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Arjuni Morgaon Gondia News: अर्जुनी मोरगांव के प्रसिद्ध फर्जी अत्याचार मामले में आखिरकार न्याय मिल गया है और दीपेश रामू प्रतापभाई जिवानी को जिला व सत्र न्यायालय, गोंदिया ने बरी कर दिया है। 1 अप्रैल 2026 को सत्र न्यायाधीश एम. टी. असीम ने विस्तृत सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया और लगभग साढ़े पांच वर्ष से चल रहे मामले पर पर्दा डाल दिया।

शहर के उत्तरी भाग में गट क्र. 148 6.24 हेक्टेयर के कुल क्षेत्रफल में से 0.60 हेक्टेयर में पगडंडी सड़क व मालिकाना हक को लेकर नीलकंठ श्यामराव घनाडे और प्रतापभाई जिवानी के बीच विवाद था।

विवाद बढ़ गया और थाने तक पहुंच गया। 8 मार्च 2020 को जब दोनों पक्षों को अर्जुनी मोरगांव थाने में बुलाया गया, तो घटना ने अचानक मोड़ ले लिया और मामले को एट्रोसिटी का रूप दे दिया गया। नीलकंठ घनाडे ने शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि दीपेश जिवानी ने जातिगत अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

शिकायत के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया। न्यायालय में सुनवाई के दौरान गवाही और भौतिक साक्ष्य में विसंगतियां पाई गईं। फिर्यादी पक्ष आरोप साबित करने के लिए आवश्यक पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा है। सभी पक्षों पर गहनता से विचार करने के बाद न्यायालय ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए जरूरी सबूत उपलब्ध नहीं हैं।

इसलिए, यह आदेश दिया गया कि दीपेश रामू जिवानी को बरी किया जा रहा है। लंबे संघर्ष के बाद न्याय दीपेश जिवानी को इस मामले की वजह से करीब 5 वर्ष 6 महीने और 3 दिन तक मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और शारीरिक तकलीफ झेलनी पड़ी।

बरी होने के बाद उन्होंने न्यायपालिका पर भरोसा जताया, लेकिन इस बात का अफसोस भी जताया कि ऐसी झूठी शिकायतों से आम नागरिकों की जिंदगी बर्बाद हो रही है। फैसले के बाद दीपेश जिवानी ने संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

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