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पहली बार नागपुर पहुंचे CJI गवई, बोले- बाबासाहेब के विचारों से मिला सर्वोच्च पद
Nagpur New: CJI भूषण गवई पदभार संभालने के बाद पहली बार नागपुर पहुंचे। यहां उन्होंने एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। वह 29 जून तक नागपुर में रहेंगे।
- Written By: सोनाली चावरे

CJI भूषण गवई (pic credit; social media)
नागपुर: देश के प्रधान न्यायाधीश भूषण गवई शुक्रवार को नागपुर पहुंचे। उनका विमानतल पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश व अन्य अधिकारियों द्वारा स्वागत किया गया। पदभार स्वीकार करने के बाद वे पहली बार शहर आए हैं। इस दौरान जिला न्यायालय के परिसर में डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर की प्रतिमा और संविधान के प्रास्ताविक का लोकार्पण न्यायाधीश गवई के हाथों किया गया।सीजेआई 29 जून तक सिटी में विविध कार्यक्रमों में उपस्थित रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायाधीश भूषण गवई ने शुक्रवार को कहा कि आजाद भारत में सम्प्रभुता बनाए रखने के लिए बाबासाहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने अथक प्रयास कर देश को संविधान दिया। संविधान समिति के अन्य सदस्यों ने भी संविधान तैयार करते समय चर्चा में हिस्सा लेकर देश की जनता के हितों तथा देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए निर्णय लिए। ढाई वर्षों तक चली इस प्रक्रिया के बाद देश को अभूतपूर्व संविधान मिला। इसकी वजह से देश की अखंडता बरकरार है।
जज बनने की जीवन में सुखद घटना
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सीजेआई गवई ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ घटनाएं होती हैं। इसमें कुछ अच्छी और कुछ बुरी घटनाएं होती हैं। इसी तरह की एक घटना मेरे जीवन में हुई। 90 के दशक तक वकालत करने के बाद अचानक जज बनने का मौका आया। नियमों और प्रक्रिया के अनुसार इस पर मुहर लगने में देरी होते देख जज बनने के बदले सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने की इच्छा मन में जागृत हुई। पिता की इच्छा और कामना ने जज बनने तक का सफर तय करने की हिम्मत दी। इसके बाद अब सुको तक का सफर तय हुआ है।
सीजेआई गवई ने कहा कि मेरी दृष्टि में यह घटना काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान की प्रास्ताविक काफी सराहनीय है। यह 4 स्तंभों पर आधारित है। इसमें न्याय, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, समानता, स्वतंत्रता और मान्यता जैसे महत्वपूर्ण अंग जुड़े हैं। इसमें भी एकता और समग्रता देश के लिए महत्वपूर्ण है।
बाबासाहब के विचारों के कारण सर्वोच्च पद
यादों को ताजा करते हुए प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा कि बाबासाहब के विचारों और उनके विचारों की प्रेरणा के कारण देश के सर्वोच्च स्थान तक पहुंच पाया हूं। जिस समय मुंबई में वकालत शुरू की थी, उस समय बंबई हाई कोर्ट में बाबासाहब की प्रतिमा नहीं थी। चुनाव लड़ने का मौका मिलने के बाद 1985 में बाबासाहब की प्रतिमा स्थापित करने का मौका मिला। इसी तरह से जिस समय नागपुर बेंच में प्रशासकीय न्यायाधीश के पद पर रहा, हाई कोर्ट की इमारत में भी उनकी प्रतिमा स्थापित की। अब जिस बार एसोसिएशन का सदस्य रहा हूं, उस जिला बार एसोसिशन द्वारा स्थापित प्रतिमा का लोकार्पण करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि चित्रों और प्रतिमाओं के साथ व्यक्ति को संबंधित व्यक्ति के विचारों का एक मार्गदर्शन मिलता है। उसी मार्ग पर व्यक्ति चलने का प्रयास करता है। यही मेरे जीवन में भी हुआ है।
अचानक नम हो गईं आंखें
भाषण देते हुए प्रधान न्यायाधीश गवई की उस समय अचानक आंखें नम हो गईं। जब वकालत के पेशे में आने के लिए प्रेरित करने वाले तथा मेरा बेटा एक दिन देश का प्रधान न्यायाधीश बनेगा बोलने वाले पिता की आद आ गई। प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा कि वकालत के पेशे में आने का कोई मन नहीं था लेकिन पिता ने हमेशा ही लोगों को न्याय दिलाने की प्रेरणा देते हुए वकालत के लिए प्रेरित किया। आज उनकी कामना के अनुसार मैं देश का मुख्य न्यायाधीश बन गया हूं लेकिन यह देखने के लिए वे जिंदा नहीं हैं। बहरहाल माता के साथ में होने का काफी सुकून है। उन्होंने वकालत के पेशे में वरिष्ठ अधिवक्ता भैयासाहब बोबडे और वरिष्ठ अधिवक्ता वी.आर. मनोहर की काफी महत्वपूर्ण भूमिका और मार्गदर्शन होने की जानकारी भी उजागर की।
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लोगों को न्याय देने का प्रयास
प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा कि वकालत के पेशे से लेकर जज की कुर्सी से भी लोगों को किस तरह से न्याय दिया जा सकेगा, यही प्रयास किया है। मुंबई में वकालत शुरू करते ही सर्वप्रथम 1985 में एक दलित समाज के युवा को मेडिकल में प्रवेश के लिए न्यायिक जंग लड़ी। उसमें सफलता मिली। देश की आजादी के बाद 1985 तक किसी भी मेहतर समाज के युवा को मेडिकल में प्रवेश नहीं मिल पाया था। लेकिन वकालत करते समय न्याय दिला पाया। इसी तरह से हाई कोर्ट में बतौर सरकारी वकील रहते समय सिटी की सभी झोपड़पट्टियों को हटाने का एक आदेश हुआ था। इससे लाखों लोग बेघर होने जा रहे थे। सरकारी वकील रहते हुए बेघरों को बचाने की जुगत में रहा।
सुको तक इसकी लड़ाई लड़ी और बाद में सरकार ने योजना लाकर इन झोपड़पट्टी वासियों को नियमित करने का निर्णय लिया। सर्वोच्च न्यायालय में चीफ जस्टिस बनते ही झुड़पी जंगल के कारण कई झोपड़पट्टियों और सिंचाई के प्रकल्प तथा किसानों की जमीन का मसला अटका हुआ था। 40 वर्षों से अटके इस मामले में संवैधानिक और कानूनी अमलीजामा पहनाकर फैसला सुनाया गया। इसका सुकून है।
Cji gavai in nagpur district courts judicial activism shouldnt turn into judicial terrorism
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