टाइगर प्रोजेक्ट विस्तार से ग्रामीणों में हड़कंप, बाघ संरक्षण या ग्रामीणों का विस्थापन? लोगों में भय
Tiger Reserve Expansion Protest: नवेगांव-नागझिरा टाइगर प्रोजेक्ट के बफर ज़ोन विस्तार से भंडारा-गोंदिया के 183 गांवों की आजीविका पर संकट आया है। ग्रामीणों में भय व प्रशासन पर नाराजगी है।
- Written By: आंचल लोखंडे
टाइगर प्रोजेक्ट विस्तार से ग्रामीणों में हड़कंप (सौजन्यः सोशल मीडिया)
Navegaon Nagzira Buffer Zone Issue: नवेगांव-नागझिरा टाइगर प्रोजेक्ट के बफर ज़ोन विस्तार की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुँच चुकी है और इसका भंडारा–गोंदिया जिले के 183 गांवों पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। लगभग 55,000 की आबादी तथा खेती, वनोपज और गौण वन उत्पादन पर आधारित हजारों परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। जनजागरूकता का अभाव, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और प्रशासन की उदासीनता ने ग्रामीणों के बीच गहरा असंतोष पैदा कर दिया है।
इस विस्तार में भंडारा जिले के 72 और गोंदिया जिले के 111 गांव यानी कुल 183 संभावित प्रभावित गांव शामिल हैं। इनमें 28 रिठी क्षेत्र के गाँव भी सम्मिलित हैं। लगभग 16,700 हेक्टेयर वन भूमि को वन्यजीव विभाग को हस्तांतरित किया जा रहा है। क्षेत्र में कड़े वन्यजीव संरक्षण कानून लागू होने के बाद ग्रामीणों के आवागमन, कृषि, पशुपालन तथा वन-संपदा संग्रहन पर सख्त प्रतिबंध लग सकते हैं। इससे ग्रामीणों की मूल जीवनशैली पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
गोपनीय प्रक्रिया
तेंदू, मोह, लकड़ी, चारा-पानी और पशुपालन जैसी वन आधारित आजीविकाओं पर निर्भर हजारों परिवारों पर सबसे बड़ा आर्थिक प्रहार होने की संभावना है। बफर और कोर ज़ोन के सख्त नियम ग्रामीणों को दैनिक रोजगार और जीविकोपार्जन के स्रोतों से दूर कर देंगे, जिससे गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। विस्तारीकरण प्रक्रिया में प्रभावित गाँवों को विश्वास में न लेना, नियमों की स्पष्ट जानकारी न देना और जनजागृति नहीं करना इन प्रशासनिक कमियों के कारण जनता का आक्रोश बढ़ गया है।
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ग्रामीणों का कहना है कि हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णय हमारी जानकारी के बिना लिए जा रहे हैं। बफर ज़ोन के नियमों एवं संभावित दुष्परिणामों की पूरी जानकारी न होने से लोग भविष्य को लेकर भय और अनिश्चितता में हैं।
व्यापक सामाजिक संघर्ष
ग्रामीण समूहों का आरोप है कि बाघ संरक्षण के नाम पर हो रहा यह विस्तार उनके लिए कठोर और जन-विरोधी नियमों का रूप ले रहा है। ग्रामीण पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं, परंतु उनका कहना है कि यदि उनके अस्तित्व पर असर डालने वाले कड़े कानून लागू होने हैं तो स्पष्ट जानकारी और उचित विकल्प उन्हें पहले उपलब्ध कराए जाएं। इस गंभीर मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और प्रशासन की लापरवाही ग्रामीणों के संदेह को और गहरा कर रही है। यदि बफर ज़ोन विस्तार को इसी तरह जल्दबाज़ी और गोपनीयता में अंतिम रूप दिया गया, तो क्षेत्र में व्यापक सामाजिक संघर्ष खड़ा होने की संभावना है, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है।
फसल-नुकसान और पशुधन की बर्बादी
“इंसानियत को दरकिनार कर सरकार वन क्षेत्र से लगे 183 गाँवों के नागरिकों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार कर रही है। बिना जनजागृति, बिना ग्रामसभा और बिना किसी पारदर्शिता के गुप्त तरीके से बफर ज़ोन का विस्तारीकरण करना नियमों का घोर उल्लंघन है और हम इसका कड़ा विरोध करते हैं। वन क्षेत्रों में रहने वाले लोग ही वर्षों से वन्यजीवों का संरक्षण कर रहे हैं, जबकि वे स्वयं बाघ हमलों, मौत, फसल-नुकसान और पशुधन की बर्बादी का भारी दुख झेल रहे हैं। किसानों की खेती तबाह है, मजदूरों की रोज़ी पर संकट है और सरकार के पास कोई ठोस राहत योजना नहीं।
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जानवरों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता
आज स्थिति यह है कि लोगों की जान से ज़्यादा जानवरों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता बन गई है। यह इंसानियत के खिलाफ कदम है। विधायक नाना पटोले ने कहा कि यदि प्रभावित गाँवों को विश्वास में लिए बिना नवेगांव-नागझिरा व्याघ्र प्रकल्प के बफर ज़ोन विस्तार का निर्णय आगे बढ़ाया गया, तो हम व्यापक जन आंदोलन छेड़कर सरकार को इसकी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करेंगे। लोकतंत्र में हुकूमशाही नहीं, जनता की आवाज़ चलेगी।”
