Bhandara News: मानसून में भंडारा के 11 गांवों का टूट जाता है संपर्क, ग्रामीणों की बढ़ती मुश्किलें
Bhandara Monsoon: भंडारा जिले के 154 गांव मानसून में बाढ़ के खतरे से जूझ रहे हैं। हर साल 130 गांव प्रभावित होते हैं और 11 गांवों का संपर्क टूट जाता है।
- Written By: आंचल लोखंडे
Bhandara Flood (सोर्सः फाइल फोटो-सोशल मीडिया)
Bhandara Flood News: प्रकृति जब अपनी ही संतानों के प्रति निष्ठुर हो जाए, तो बेबसी और आंसुओं के सिवा कुछ शेष नहीं बचता। भंडारा जिले को अपने आंचल से सींचने वाली वैनगंगा, बावनथड़ी, सूर और चूलबंद नदियां यहां की जीवनदायिनी तो कहलाती हैं, लेकिन हर साल मानसून के आगमन के साथ ही ये नदियां किसी अभिशाप की तरह अपना रौद्र रूप अख्तियार कर लेती हैं।
मानसून की शुरुआत होते ही इन नदियों के किनारे बसे 154 गांवों के मासूम चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई देने लगती हैं। नदी किनारे रहने वाले इन ग्रामीणों की आंखों में तबाही का खौफ साफ पढ़ा जा सकता है। इनमें से लगभग 130 गांव ऐसे हैं, जो हर साल बाढ़ की विभीषिका में किसी न किसी रूप में नुकसान झेलते हैं। कई बार स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि जीवन भर संजोई उम्मीदें पल भर में टूट जाती हैं।
भंडारा में हर साल बाढ़ की तबाही
अक्सर तबाही का यह मंजर दोहराए जाने के बावजूद प्रशासन के संवेदनहीन रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। इस वर्ष भी मानसून शुरू हो चुका है। इस वर्ष अल नीनों का असर रहने से सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई गई है। अगर पिछले 13 वर्षों के रिकॉर्ड को देखें, तो जिले में सबसे अधिक बारिश वर्ष 2013 में 1684।34 मिमी (132 प्रतिशत) दर्ज की गई थी, जबकि सबसे कम बारिश वर्ष 2017 में मात्र 884।01 मिमी (67 प्रतिशत) हुई थी।
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क्षेत्र के पेयजल हो जाते हैं दूषित
इस भयानक प्राकृतिक विभीषिका के दौरान जिले के 11 गांव तो पूरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं। पिंडकेपार, सुरेवाडा, मुंढरी बु।, ढीमरवाडा, घाटकुरोडा, तामसवाडी, परसवाडा, पवना खुर्द, पाहूनगांव, आवली और खेलमारा बुजुर्ग जैसे गांवों के लोग कई-कई दिनों तक संपर्क टूटने परेशानीभरी जिंदगी जीने को विवश हो जाते हैं।
इन गांवों में बाढ़ के दौरान बिजली पूरी तरह गुल हो जाती है, पेयजल के पारंपरिक स्रोत दूषित हो जाते हैं और आपात स्थिति में कोई सरकारी डॉक्टर तक नसीब नहीं होता। ऐसे में मजबूर ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर निजी झोलाछाप डॉक्टरों की शरण लेते हैं।
केवल कागजी खानापूर्ति नहीं, ठोस कार्रवाई जरूरी
मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती, जब बाढ़ का पानी उतरता है, तब घरों के मलबे और कीचड़ में जहरीले सांप-बिच्छुओं का खौफ मंडराने लगता है। प्रशासनिक उपेक्षा की दोहरी मार झेल रहे इन ग्रामीणों के नसीब को स्थाई रूप से बदलने का कोई गंभीर प्रयास आज तक नहीं हुआ। प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त रहता है।
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130 गांव झेलते हैं भारी नुकसान
अब थके-हारे और डरे हुए ग्रामीणों ने एक बार फिर नम आंखों से सुरक्षा, राहत सामग्री, स्वच्छ पेयजल, निर्वाध बिजली और पुख्ता चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन से गुहार लगाई है। देखना होगा कि इस बार प्रशासन समय रहते जागता है या फिर इन ग्रामीणों को एक बार फिर उनके हाल पर मरने के लिए छोड दिया जाता है।
