विक्रेताओं के पुनर्वास पर हाईकोर्ट सख्त, 9 अप्रैल को बैठक के आदेश; 15 अप्रैल को अगली सुनवाई
Sambhajinagar Vendors Issue: मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने विक्रेताओं के पुनर्वास पर 9 अप्रैल को संयुक्त बैठक के निर्देश दिए, 15 अप्रैल को अगली सुनवाई।
- Written By: अंकिता पटेल
Sambhajinagar Street Vendors Policy ( Source: Social Media )
Sambhajinagar Street Vendors Policy: छत्रपति संभाजीनगर शहर के फल और सब्जी विक्रेताओं के लंबित मुद्दों तथा उनके पुनर्वास को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।
मामले का सामंजस्यपूर्ण समाधान निकालने के लिए मनपा आयुक्त, संबंधित डेवलपर और याचिकाकर्ता यूनियन के प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक 9 अप्रैल को सुबह 11 बजे आयुक्त कार्यालय में आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह आदेश न्यायमूर्ति संदीपकुमार सी। मोरे और न्यायमूर्ति आबासाहेब डी. शिंदे की खंडपीठ ने दिए। औरंगाबाद जिला फल व सब्जी विक्रेता यूनियन द्वारा वर्ष 2012 में दायर जनहित याचिका से संबंधित अवमानना याचिका पर गुरुवार 2 अप्रैल को सुनवाई हुई।
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दोनों पक्षी के वकीलों द्वारा रखे गए मौखिक प्रस्ताव के अनुसार विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने के लिए यह बैठक आयोजित की जाएगी। 9 अप्रैल की बैठक में हुई चर्चा का सकारात्मक निष्कर्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
मामले की अगली सुनवाई अब 15 अप्रैल 2026 को तय की गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता फल व सब्जी विक्रेता यूनियन की ओर से अधिवक्ता विनोद प्रकाश पाटील ने पैरवी की।
राज्य शासन की ओर से अधिवक्ता ए। एस। देशमुख ने पक्ष रखा। वहीं प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता संभाजी एस। टोपे तथा तलेकर एसोसिएट्स के माध्यम से अधिवक्ता अजिंक्य काले ने पैरवी की।
सब्जी मंडी तोड़ना प्रस्तावित
औरंगाबाद जिला फल व सब्जी विक्रेता युनियन की ओर से वर्ष 2013 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। उस समय अगले दिन सुबह आठ बजे सब्जी मही को तोड़े जाने की कार्रवाई प्रस्तावित थी। इस पर खंडपीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए उसी रात लगभग साढ़े नौ बजे अंतरिम आदेश जारी किया था।
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इसके बाद समय-समय पर सुनवाई हुई और मनपा ने विक्रेता यूनियन के सदस्यों के साथ बैठक कर समाधान निकालने का आश्वासन दिया, औरंगपुरा स्थित सब्जी मंडी खाली कर वहां नई इमारत का निर्माण किया गया, लगभग 150 सब्जी विक्रेताओं को 18 महीने के भीतर नई इमारत में स्थानांतरित करने का वादा किया गया था। हालांकि अब तक उनका पुनर्वास नहीं हो पाया है। इसी कारण वर्ष 2015 में अवमानना याचिका दाखिल की गई थी।
