
Standing Committee Election:अकोला महानगरपालिका (सोर्सः AI-सोशल मीडिया)
Akola Municipal Corporation Politics: अकोला महानगरपालिका (मनपा) चुनाव में किसी भी दल या आघाड़ी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण महापौर पद भाजपा के खाते में जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इसके बाद स्थायी समिति पर नियंत्रण पाने के लिए भाजपा को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।
मनपा की 16 सदस्यीय स्थायी समिति में भाजपा अपने दम पर केवल 8 सदस्य ही नियुक्त कर सकती है। बहुमत हासिल करने के लिए उसे कम से कम एक अतिरिक्त सदस्य की आवश्यकता होगी। मनपा में कुल 80 पार्षद हैं और हर 5 पार्षदों पर एक स्थायी समिति सदस्य चुना जाता है। इसी आधार पर स्थायी समिति में कुल 16 सदस्य होते हैं।
वर्तमान स्थिति के अनुसार भाजपा के 38 पार्षदों के आधार पर उसे 7.6 सदस्य, कांग्रेस के 21 पार्षदों पर 4.2 सदस्य, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 6 पार्षदों पर 1.2 सदस्य और वंचित बहुजन आघाड़ी के 5 पार्षदों पर 1 सदस्य चुना जा सकता है। अपूर्णांक नियम के अनुसार भाजपा को 8, कांग्रेस को 4, शिवसेना (उबाठा) और वंचित बहुजन आघाड़ी को 1-1 सदस्य मिलते हैं। इस प्रकार कुल 14 सदस्य तय हो जाते हैं।
शेष 2 सदस्य अन्य 6 पार्षदों के गठबंधन से चुने जाएंगे। यदि यह गठबंधन विरोधी दलों के पक्ष में गया, तो भाजपा और विरोधी दलों का संख्याबल बराबर हो सकता है। कांग्रेस और शिवसेना (उबाठा) के अपूर्णांक समान होने के कारण स्थिति और जटिल बनी हुई है। यही कारण है कि स्थायी समिति पर कब्जा जमाने के लिए भाजपा को किसी न किसी दल से समझौता करना अनिवार्य हो गया है।
भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के उद्देश्य से कांग्रेस अन्य दलों को एकजुट करने के प्रयास कर रही है। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि उसे किसी पद की लालसा नहीं है, बल्कि उसका एकमात्र उद्देश्य भाजपा को सत्ता से दूर रखना है।
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भाजपा अपने सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, महानगर विकास समिति, एक निर्दलीय पार्षद और राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार गुट) के तीन पार्षदों को साथ लेकर 44 का आंकड़ा छूने की कोशिश कर सकती है। यदि यह संख्या पूरी हो जाती है, तो स्थायी समिति में भाजपा और उसके सहयोगियों का संख्याबल बढ़ जाएगा।
हालांकि, इस राजनीतिक जोड़-तोड़ में शामिल दलों को स्थायी समिति सदस्य, उपमहापौर या सभापति जैसे पद दिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी जिला परिषद चुनावों को ध्यान में रखते हुए मनपा की सत्ता का अंतिम समीकरण तय किया जाएगा। राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु, इसलिए सत्ता समीकरण किसी भी समय बदल सकता है।






