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सरकार का जवाब असंवेदनशील…इंदौर त्रासदी पर हाई कोर्ट ने लगाई फटकार, कहा- शहर की छवि खराब हुई
- Written By: अर्पित शुक्ला
Indore Contaminated Water: हाई कोर्ट ने कहा कि इस घटना ने शहर की छवि को नुकसान पहुंचाया है। इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर है, लेकिन अब दूषित पेयजल की वजह से यह पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया है।

इंदौर त्रासदी पर हाई कोर्ट में सुनवाई (Image- Social media)
High Court on Indore Contaminated Water Case: इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर एमपी हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने कहा कि इस घटना से शहर की छवि को गहरी चोट पहुंची है। इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है, लेकिन अब दूषित पेयजल के कारण यह पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर पीने का पानी ही दूषित हो जाए, तो यह बेहद गंभीर चिंता का मामला है। अदालत ने कहा कि वह इस प्रकरण में मुख्य सचिव को सुनना चाहती है, क्योंकि यह समस्या केवल शहर के एक हिस्से तक सीमित नहीं है। दरअसल, पूरे इंदौर शहर का पीने का पानी सुरक्षित नहीं है।
दूषित जल पीने से अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है। फिलहाल अस्पतालों में 110 मरीज भर्ती हैं। कुल मिलाकर अब तक 421 मरीजों को अस्पताल में भर्ती किया गया, जिनमें से 311 को छुट्टी दी जा चुकी है। आईसीयू में 15 मरीजों का इलाज जारी है। उल्टी-दस्त के 38 नए केस सामने आए हैं, जिनमें से 6 मरीजों को अरबिंदो अस्पताल रेफर किया गया है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि प्रभावित क्षेत्र में जो पानी सप्लाई किया जा रहा है, वह अभी भी पीने योग्य नहीं है। गौरतलब है कि 31 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को निर्देश दिए थे कि नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए। इस संबंध में एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई है, लेकिन याचिकाकर्ताओं के वकील का कहना है कि जमीनी हालात अब भी नहीं सुधरे हैं।
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समय रहते कार्रवाई नहीं हुई
अन्य याचिकाओं में यह मुद्दा भी उठाया गया कि इस घटना से पहले स्थानीय लोगों ने कई बार शिकायतें की थीं, लेकिन प्रशासन ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। यदि समय रहते इन शिकायतों पर ध्यान दिया गया होता और जरूरी रोकथाम के कदम उठाए गए होते, तो यह हादसा टल सकता था।
हाईकोर्ट के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को आदेश दिया है कि वे अपना जवाब दाखिल करें और एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार शामिल है।
हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़े मुद्दों को सात श्रेणियों में वर्गीकृत किया है-
- प्रभावित लोगों के लिए त्वरित और आपात निर्देश
- रोकथाम और सुधार के उपाय
- जिम्मेदारी तय करना
- अनुशासनात्मक कार्रवाई
- मुआवजा
- स्थानीय निकायों के लिए निर्देश
- जन-जागरूकता और पारदर्शिता
पुरानी रिपोर्ट पर भी नहीं हुई कार्रवाई
सीनियर काउंसिल ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2022 में महापौर द्वारा पीने के पानी की आपूर्ति के लिए नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन फंड जारी न होने के कारण यह काम आज तक शुरू नहीं हो सका। इसके अलावा, साल 2017-18 में इंदौर के अलग-अलग इलाकों से लिए गए पानी के 60 सैंपलों में से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए थे। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस रिपोर्ट के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
यह भी पढ़ें- JNU में ‘कब्र खुदेगी’ रिटर्न्स! मोदी-शाह के खिलाफ लगे भड़काऊ नारे, VIDEO पर मचा बवाल
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस मामले में संबंधित अधिकारी केवल नागरिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि आपराधिक जिम्मेदारी के भी दोषी हैं। उन्होंने पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की है।
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