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आज विश्व कला दिवस पर देखिए इन भारतीय कलाओं की खूबसूरत झलक, हर एक कला में छिपा पारंपरिक महत्व
आज दुनियाभर में 15 अप्रैल को विश्व आर्ट दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन दुनियाभर की कला और कलाकारों के योगदान को दर्शाता है। भारत में भी ऐसी कई खूबसूरत कलाएं है जो देश की विशिष्टता का बखान करती है।
- Written By: दीपिका पाल
जानिए इन भारतीय कलाओं के बारे में (सौ. सोशल मीडिया)

World Art Day 2025: कला, एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है जो कलाकार के रचनात्मक परख और सोच को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत करती है। आज दुनियाभर में 15 अप्रैल को विश्व आर्ट दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन दुनियाभर की कला और कलाकारों के योगदान को दर्शाता है। भारत में भी ऐसी कई खूबसूरत कलाएं है जो देश की विशिष्टता का बखान करती है। चलिए जानते है मधुबनी कला से लेकर तंजौर कला के बारे में।

वर्ली पेंटिंग- इस कला का नाता महाराष्ट्र के ठाणे और नासिक क्षेत्रों से है। जहां पर पहली बार इस कला को वर्ली कलाकारों ने 2500 ईसा पूर्व रचना की थी। इन पैंटिग में आपको मुख्यतः जनजाति के प्राकृतिक वातावरण और सामाजिक रिवाज नजर आएंगे। पहली बार वर्ली कलाकारों ने मिट्टी से बनी दीवारों पर सफ़ेद पेस्ट पर दी गई थी। बारी-बारी से बांस के डंडों के एक छोर को कूंच कर पेंटब्रश के रूप में काम में लिया जाता है।आधुनिक हास्य-चित्रों (कैरीकेचर) की रचना के लिए गेरुआ पृष्ठभूमि और सफ़ेद पेंट का प्रयोग करते है।
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मधुबनी कला- इस कला का नाता बिहार और नेपाल क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। इस कला को पहली बार 1930 के दशक में भूकंप के बाद सामने लाया गया। इन कलाओं में खासकर दीवारों पर देवी-देवताओं, पशुओं और पेड़-पौधों का चित्रण करने वाली चित्रकारी और भित्ति-चित्र महिला कलाकार उकेरती है। इसके साथ ही इन कलाओं में अपने ज्यामितीय पैटर्न के प्रयोग के कारण विशिष्ट है और दूसरी संस्कृतियों और रीति-रिवाज़ों को दिखाया जाता है।

कलमकारी पैंटिंग- भारत की इस कला के बारे में जानकारी देते चलें तो, इसका इतिहास 3 हजार साल पुराना माना गया है। फारसी डिजाइन से इस कला की अलग पहचान है। कलमकारी कला एक तरह से ऐसी कला है जिसमें “कलम से बने रेखाचित्र” दर्शाएं जाते है। कलमकारी हलके, प्राकृतिक रंगों, जैसे कि हरे, लाल, इंडिगो, मस्टर्ड और काले रंगों के प्रयोग से पहचानी जाती है। पारंपरिक कथाओं को इस पैंटिंग में दिखाया जाता है।

पट्टचित्र- इस कला का इतिहास भी काफी पुराना है। पांचवी सदी में पहली बार ओडिशा और पश्चिम बंगाल राज्यों में इस कला का प्रादुर्भाव हुआ। पट्टचित्र की धार्मिक और पौराणिक विषयवस्तु कला के पारखियों के लिए पहचानी जाने लगी है। इन कलाकृतियों को बनाने के लिए कलाकार खासकर लाल, काले, नीले, पीले और सफ़ेद जैसे स्पष्ट रंगों का प्रयोग करते हैं। जानकारी आपको ना हो कि, ताड़ (पाम) के पत्तों से लेकर सिल्क तक, इस कला रूप का विकास हुआ है।

कालीघाट - इस चित्रकला का नाता पश्चिम बंगाल क्षेत्र से सन् 19वीं सदी से आता है। यह कालीघाट कला को खासकर कपड़ों और पट्टों पर उकेरा जाता है। इन चित्रकारियों में अक्सर प्राचीन महाकाव्यों के देवताओं, देवियों और और दृश्यों का चित्रण होता था।कालीघाट की चित्रकारी की विशिष्टता वह ख़ास रूपरेखा है जो पूरी कलाकृति में लगातार और प्रवाहमान होती है।

तंजौर कला- इन भारतीय कलाओं में इस खास कला का नाम भी शामिल किया गया है। इस कला का नाता तमिलनाडु के तंजावुर क्षेत्र से है जहां पर 16वीं सदी में चोला वंश के शासनकाल में पहली बार इसकी रचना की थी। इस कला की बात की जाए तो, इन कलाओं में खासकर देवी- देवताओं के चित्र उकेरे जाते है। इन चित्रकारियों को लकड़ी के तख्तों पर बनाया जाता है। इस कला का नाता इतिहास से जुड़ा है दक्कनी और मराठा दोनों कलाओं के अलावा इसमें यूरोपीय कला का प्रादुर्भाव हुआ था।
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