FGM 2026: 6 फरवरी को क्यों मनाया जाता है इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर FGM, जानें इसका महत्व और इतिहास

FGM 2026 History: हर साल 6 फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर FGM मनाया जाता है। इसका उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ होने वाली इस दर्दनाक कुप्रथा को जड़ से खत्म करना और जागरूकता फैलाना है।
International Day of Zero Tolerance for FGM 2026 Awareness
जागरूकता अभियान में शामिल महिलाएं (सौ. एआई)
Updated on

FGM Zero Tolerance Day 2026: आज 6 फरवरी है यानी इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस फॉर फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (International Day of Zero Tolerance for Female Genital Mutilation) दिवस दुनियाभर में मनाया जाता है। यह दिन महज एक तारीख नहीं है बल्कि दुनिया भर की उन 230 मिलियन (23 करोड़) महिलाओं और लड़कियों के हक की आवाज है जिन्होंने अपनी इच्छा के विरुद्ध इस शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना को झेला है।

क्या है फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM)

फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन जिसे आम भाषा में खतना भी कहा जाता है एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बिना किसी चिकित्सीय कारण के महिलाओं के जननांगों के बाहरी हिस्से को आंशिक या पूर्ण रूप से हटा दिया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार यह पूरी तरह से असुरक्षित और अमानवीय कृत्य है जिससे लड़कियों को अत्यधिक रक्तस्राव, संक्रमण, बांझपन और यहां तक कि मृत्यु का खतरा भी बना रहता है।

6 फरवरी का इतिहास

इस दिन की शुरुआत की कहानी साल 2003 से जुड़ी है। नाइजीरिया की तत्कालीन प्रथम महिला स्टेला ओबासांजो ने आधिकारिक तौर पर अफ्रीका में फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन के खिलाफ शून्य सहिष्णुता का अभियान शुरू किया था। बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए 2012 में एक प्रस्ताव पारित किया और हर साल 6 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया। तब से यह दिन दुनिया भर में जागरूकता फैलाने का एक बड़ा मंच बन गया है।

महत्व और 2030 का लक्ष्य

इस दिवस का मुख्य उद्देश्य उन सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़ियों को तोड़ना है जो FGM को एक 'परंपरा' के रूप में बढ़ावा देते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने अपने सतत विकास लक्ष्यों के तहत साल 2030 तक इस कुप्रथा को दुनिया से पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया है।

FGM 2026 की थीम और भविष्य की चुनौती

हर साल यह दिन एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है जो पीड़ितों की आवाज को बुलंद करने और वैश्विक एकजुटता पर केंद्रित होता है। 2026 में भी जोर इस बात पर है कि कैसे स्थानीय समुदायों और युवाओं को साथ लेकर इस कुप्रथा के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाएं। यूनिसेफ (UNICEF) की रिपोर्ट के अनुसार यदि अभी कड़े कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में लाखों और लड़कियां इस खतरे की चपेट में आ सकती हैं।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वास्थ्य और आत्मसम्मान के साथ जीने का अधिकार हर बेटी का मौलिक हक है। शिक्षा और सामूहिक प्रयास ही इस अंधेरे को मिटाने का एकमात्र जरिया हैं।

Navbharat Live
navbharatlive.com