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Explainer: सिर्फ 48 घंटे शेष! क्या सचमुच नक्सल-मुक्त होगा भारत? जानें गृह मंत्रालय के दावों की जमीनी हकीकत
Naxalism In India: गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2010 की तुलना में नक्सली हिंसा में 70% से अधिक की कमी आई है। एक समय देश के 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, जो अब सिमटकर महज 30-35 जिलों तक रह गए हैं।
- Written By: मनोज आर्या

प्रतीकात्मक तस्वीर, (सोर्स- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)
Amit Shal Naxal Deadline: भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में 31 मार्च 2026 की तारीख एक बड़े मील के पत्थर के रूप में दर्ज होने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार सार्वजनिक मंचों से यह संकल्प दोहराया है कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया कर दिया जाएगा। अब जब इस समयसीमा में केवल दो दिन शेष हैं, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या भारत सचमुच ‘नक्सल-मुक्त’ होने की कगार पर है? आइए सबकुछ विस्तार से जानते हैं।
सरकार के अल्टीमेटम का आधार क्या है?
पिछले दो वर्षों में केंद्र सरकार ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा घेराबंदी की है। इसी का नतीजा है कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लगातार नक्सलियों के मारे जाने की खबर आती रही। इसके अलावा कुछ नक्सलियों ने खुद ही हथियार डाल दिए। सरकार के इस अल्टीमेटम के पीछे तीन मुख्य स्तंभ रहे हैं-
- 1. ऑपरेशन ‘कगार’ और सर्जिकल स्ट्राइक: छत्तीसगढ़ के बस्तर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे दुर्गम इलाकों में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के कोर एरिया में घुसकर प्रहार किया है। अकेले 2024 और 2025 में रिकॉर्ड संख्या में बड़े नक्सली कमांडर ढेर किए गए।
- 2. फॉरवर्ड ब्लॉक: सरकार ने उन इलाकों में भी सुरक्षा कैंप (FOBs) स्थापित कर दिए हैं, जहां पिछले सात दशकों से पुलिस का पैर रखना नामुमकिन था। ‘अबूझमाड़’ जैसे इलाकों में अब सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी है।
- 3. विकास की बयार: सड़क, पुल और मोबाइल टावरों के जाल ने नक्सलियों के ‘सूचना तंत्र’ को कमजोर कर दिया है। ‘आकांक्षी जिला कार्यक्रम’ के तहत शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं ने स्थानीय युवाओं का झुकाव मुख्यधारा की ओर बढ़ाया है।
अब तक कितनी मिली सफलता?
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2010 की तुलना में नक्सली हिंसा में 70% से अधिक की कमी आई है। एक समय देश के 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, जो अब सिमटकर महज 30-35 जिलों तक रह गए हैं। झारखंड का ‘बूढ़ा पहाड़’ पूरी तरह नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है। बिहार में अब नक्सली गतिविधियां नगण्य हैं। अब मुख्य चुनौती केवल छत्तीसगढ़ के ‘बस्तर डिवीजन’ और महाराष्ट्र-ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों तक सीमित है।
क्या 31 मार्च तक ‘पूरी तरह’ सफाया संभव?
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘नक्सलवाद का खात्मा’ एक प्रक्रिया है, कोई एक दिन की घटना नहीं। हालांकि, सरकार ने वैचारिक और सैन्य रूप से नक्सलियों की कमर तोड़ दी है, लेकिन इसके पूर्ण सफाये के पीछे कुछ व्यावहारिक चुनौतियां अभी भी हैं।
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- सीमावर्ती इलाके: नक्सली अक्सर एक राज्य से दूसरे राज्य (जैसे छत्तीसगढ़ से ओडिशा या तेलंगाना) की सीमा लांघकर सुरक्षित पनाह पा लेते हैं।
- शीर्ष नेतृत्व: हालांकि स्थानीय कैडर कम हुआ है, लेकिन ‘सेंट्रल कमेटी’ के कुछ शीर्ष नेता अभी भी भूमिगत रहकर रणनीति बना रहे हैं।
- विचारधारा: हथियार बंद दस्ते को खत्म करना आसान है, लेकिन शहरी इलाकों में फैले ‘अर्बन नक्सल’ नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करना एक लंबी कानूनी और खुफिया लड़ाई है।
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सरकार के दावे में कितना दम?
अगर “खत्म होने” का अर्थ देश के अधिकांश हिस्सों से नक्सली हिंसा को समाप्त करना और उन्हें चंद पॉकेट्स तक सीमित कर देना है, तो सरकार अपने लक्ष्य के बेहद करीब है। 31 मार्च 2026 को शायद भारत ‘पूरी तरह’ नक्सल मुक्त न हो, लेकिन यह तय है कि इस तारीख तक नक्सलवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा होगा। यह तारीख सरकार की प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसने इस समस्या को दशकों तक ‘मैनेज’ करने के बजाय ‘जड़ से खत्म’ करने का साहस दिखाया है।
Will naxalism end by 31 march 2026 government deadline explainer
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