कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Muslim Politics Test: इस साल देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें से तीन राज्य ऐसे हैं जहां मुस्लिम आबादी जम्मू-कश्मीर के बाद सबसे ज्यादा है। केरल, पश्चिम बंगाल और असम में ‘किंग’ भले ही कोई बनता हो, लेकिन ‘किंगमेकर’ की भूमिका मुस्लिम आबादी ही निभाती है। अब एक बार फिर इन राज्यों सियासी शतरंज की बिसात पर चुनावी शह और मात का खेल होने वाला है।
पश्चिम बंगाल में फिलहाल मुस्लिम वोटर्स का समर्थन ममता बनर्जी की टीएमसी मिलता आ रहा है। लेकिन इस बार यहां लड़ाई दिलचस्प होने वाली है। असम का हाल-ओ-हवाल भी कुछ ऐसा ही रहने वाला है। वहीं, केरल में भी बड़ी उठापटक होने वाली है। इस लिहाज से देखें तो साल 2026 इस्लामिक सियासत का असली इम्तिहान लेने वाला है…
समूचे देश में मुस्लिम आबादी भले ही 14 से 15 फीसदी के बीच हो, लेकिन पश्चिम बंगाल, केरल और असम में यह आंकड़ा 25 से 35 फीसदी के आस-पास है। 2011 की जनगणना की को मुताबिक केरल में 27 फीसदी, बंगाल में 30 फीसदी और असम में 35 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इस कारण ही इन राज्यों में मुस्लिम दल अपना सियासी दम दिखाने के लिए बेताब दिखाई दे रहे हैं।
मुस्लिमों की सियासत ताकत को देखते हुए बंगाल में अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेकुलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतर रही हैं। इसके साथ ही असम में बदरुद्दीन अजमल की AIUDF और केरल में केरल में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने सियासी लड़ाई के लिए कमर कस ली है। साल 2026 इन तीनों ही राज्यों में का कड़ा इम्तिहान लेने वाला है।
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी भले ही 27 से 28 परसेंट बताई जाती है, लेकिन मुस्लिम वोटर करीब 30 परसेंट हैं। राज्य की 120 सीटों पर मुस्लिम वोटर अहम भूमिका निभाते हैं। मुस्लिम वोटों की राजनैतिक ताकत को पहचानते हुए फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने पहले इंडियन सेक्युलर फ्रंट नाम की पार्टी बनाई और इस बार हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद में बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने का ऐलान करके मुस्लिम पॉलिटिक्स का चेहरा बनने की कोशिश कर रहे हैं। हुमायूं कबीर ने अपनी खुद की पॉलिटिकल पार्टी जनता उन्नयन पार्टी भी बनाई है।
मुस्लिम राजनीति का लिटमस टेस्ट (इन्फोग्राफिक-AI)
2026 का बंगाल चुनाव अब्बास सिद्दीकी और हुमायूं कबीर के लिए पॉलिटिकल टेस्ट होगा। हुमायूं कबीर बाबरी के बहाने बंगाल में मुस्लिम पॉलिटिक्स बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ममता बनर्जी के साथ एकमत से खड़े मुस्लिम वोटर उनका साथ देंगे या नहीं इसका लिटमस टेस्ट इस साल होने वाला है। इसके साथ ही राज्य में ओवैसी की एंट्री भी तय मानी जा रही है। हुमायूं कबीर AIMIM को साथ लेकर चुनावी समर में उतरने का ऐलान भी कर चुके हैं। हालांकि अभी तक ओवैसी की तरफ से हरी झंडी का अब भी इंतजार है।
इससे पहले यानी 2021 के विधानसभा चुनाव में बंगाल के मुसलमानों ने TMC को 86 परसेंट वोट दिया था। नतीजतन, मुस्लिम-बहुल सीटों पर कांग्रेस और लेफ्ट का सफाया हो गया, वे अपना खाता भी नहीं खोल पाए। ममता बनर्जी खुलकर मुसलमानों के साथ खड़ी हैं, जिसका उन्हें चुनावी फायदा हर बार मिलता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मुस्लिम वोटर हुमायूं कबीर और अब्बास सिद्दीकी का साथ देंगे?
पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य असम में मुस्लिम आबादी 35 फीसदी के आस-पास है। जिसकी सियासी अहमियत को समझते हुए मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने साल 2005 में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) बनाया। अजमल ने अपना पॉलिटिकल करियर मुस्लिम माइनॉरिटी को फोकस में रखकर शुरू किया। उन्होंने खुद की छवि असमिया बोलने वाले और बंगाली मूल के मुसलमानों हिमायती के तौर पर पेश की। अजमल साल 2009 से 2024 तक असम के धुबरी से लोकसभा सांसद भी रहे।
साल 2006 के विधानसभा चुनावों में AIUDF के 10 उम्मीदवार जीत दर्ज करने में कामयाब रहे। इसके बाद 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 18 हो गया। हालांकि अगले 2 चुनाव में AIUDF की सीटों की संख्या 13 और 16 तक ही सीमित हो गई। इसके बाद बदरुद्दीन अजमल के पॉलिटिकल करियर को 2024 के लोकसभा चुनाम में में सबसे बड़ा झटका लगा और वह अपनी ही सीट हार गए। कांग्रेस मुस्लिम वोट पर फिर से अपनी पकड़ बनाती दिख रही है, जिससे 2026 का इलेक्शन अजमल के लिए बहुत जरूरी हो गया है।
असम में मुसलमानों की कुल आबादी 35 फीसदी के करीब है। यह राज्य की 126 सीटों में से 32 पर अहम भूमिका निभाती है। 2021 में 31 मुस्लिम विधायक जीते थे, लेकिन डिलिमिटेशन प्रोसेस ने मुस्लिम सीटों का खेल बदल दिया है। मुस्लिम वोटर अब 32 की जगह सिर्फ 22 सीटों पर ही अहम भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल दोनों की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर है। 2021 में बदरुद्दीन अजमल और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन इस बार वे अलग-अलग लड़ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार मुस्लिम वोटर्स का रुख क्या होगा?
दक्षिण भारतीय राज्य केरल में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, मुस्लिम आबादी 27% है, जो 8 मिलियन से ज़्यादा है। मलप्पुरम, कोझिकोड और कन्नूर जिलों में मुस्लिम वोटरों की संख्या काफी मानी जाती है। केरल में मुस्लिम समुदाय अपनी पढ़ाई-लिखाई में कामयाबी और राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में सक्रिय भागीदारी के लिए जाना जाता है। केरल में मुस्लिम राजनीति मुख्य रूप से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के इर्द-गिर्द घूमती है और माना जाता है कि इसकी पकड़ मज़बूत है।
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मुस्लिम लीग केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है। मुसलमानों के बीच इसकी मजबूत राजनीतिक पकड़ है। 1962 से हर लोकसभा में इसके कम से कम दो सांसद रहे हैं और इसने हर विधानसभा चुनाव जीता है। केरल विधानसभा की 140 सीटों में से 32 मुस्लिम विधायक हैं। इनमें से 15 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से, नौ लेफ्टिस्ट पार्टियों से, तीन कांग्रेस से, तीन इंडिपेंडेंट और एक-एक इंडियन नेशनल लीग और नेशनल सेक्युलर कॉन्फ्रेंस से हैं।
केरल में 43 ऐसी सीटे हैं जहां मुस्लिम वोटर राजनैतिक समीकरणों को बनाते-बिगाड़ते हैं। पिछले कई दशकों से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने केरल में मुसलमानों के बीच अपना दबदबा बनाए रखा है। कांग्रेस के साथ इसके अलायंस की वजह से मुस्लिम वोट बिखरे नहीं हैं। केरल का मुस्लिम-बहुल जिला मलप्पुरम हमेशा से IUML का गढ़ रहा है। इसलिए केरल में मुस्लिम लीग का अपना पॉलिटिकल असर है। यह देखना बाकी है कि 2026 के चुनावों में मुसलमानों की पहली पसंद कौन बनेगा?