पहले संसद में लगाई रोक...अब कर दिया जरूरी, 'वंदे मातरम' पर मोदी का नया दांव, ममता को हरा पाएगा बंगाल चुनाव?

Vande Mataram: राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' जो कभी अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर रहा था तो वो इस वक्त भारत की सियासत में बवाल का विषय बन गया है। इस बवाल का मकसद क्या है और इससे किसे नफा-नुकसान होगा।
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कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
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Vande Mataram Controversy: राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' जो कभी अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर रहा था तो वो इस वक्त भारत की सियासत में बवाल का विषय बन गया है। केंद्र की मोदी सरकार ने बीते कल यानी बुधवार 11 फरवरी को एक आदेश जारी करते हुए राजकीय कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत का गायन सभी 6 छंदों के साथ अनिवार्य कर दिया है।

केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद देश में एक नया राजनैतिक तूफान उठ खड़ा हुआ। टीएमसी और कांग्रेस ने सरकार पर राजनीतिकरण का आरोप लगाते हुए हमला बोला है तो दूसरी तरफ जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ मौलाना अरशद मदनी ने भी 'धार्मिक स्वतंत्रता' पर हमला बताया है। लेकिन क्या आपको पता है कि 'वंदे मातरम्' को लेकर न तो विवाद नया है और न ही सियासी हंगामा।

कब और कहां से शुरू हुआ हालिया विवाद?

दरअसल, साल 2024 में भी राज्यसभा सचिवालय ने सदस्यों को सदन की मर्यादा बनाए रखने के लिए सदन के अंदर या बाहर 'वंदे मातरम' और 'जय हिंद' जैसे नारे न लगाने की सलाह दी थी। ऐसे नारों को संसदीय शिष्टाचार का उल्लंघन बताया था। आधिकारिकता की बात करें तो 'राज्यसभा सदस्यों के लिए पुस्तिका' में उल्लिखित यह सलाह 2024 में संसदीय सत्र शुरू होने से पहले जारी की गई थी। तब भी विपक्षी दलों ने इसे लेकर केंद्र की मोदी सरकार को निशाना बनाया था।

राज्यसभा सचिवालय ने दोहराई पुरानी बात

इसके बाद बीते नवंबर में राज्यसभा के बुलेटिन में 'वंदे मातरम्' और 'जय हिंद' जैसे नारों पर रोक लगाने की बात कही गई थी। तब भारत की संसदीय रीति-रिवाजों और परंपराओं का हवाला देते हुए बुलेटिन में कहा गया है कि "सदन की कार्यवाही की गरिमा और गंभीरता की मांग है कि सदन में 'थैंक्स', 'थैंक यू', 'जय हिन्द', 'वंदे मातरम' या कोई अन्य नारा नहीं लगाया जाना चाहिए।"

टीएमसी-कांग्रेस ने किया सरकार का घेराव

तब कांग्रेस ने सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा था, 'इन नारों से तो अंग्रेजों को आपत्ति थी। भाजपाइयों को इससे क्या दिक्कत है? इसके साथ ही पश्चिम बंगाल की सीएम और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा था कि हमें याद रखना चाहिए कि 'वंदे मातरम' हमारा राष्ट्रीय गीत है। स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा विरोध का यही नारा हुआ करता था। इसे कैसे भुलाया जा सकता है। उन्होंने सरकार पर बंगाल की पहचान को नष्ट करने का आरोप लगाया था।

संसद के शीतकालीन सत्र में गरमाया माहौल

इसके बाद संसद के शीतकालीन सत्र में 'वंदे मातरम्' की 150वीं वर्षगांठ को लेकर चर्चा हुई। तब लोकसभा में पीएम मोदी ने कहा कि जब वंदे मातरम के पचास वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था और जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। इस चर्चा में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय गीत के अहम हिस्सों को हटाने की बात को मुद्दा बनाया।

इस दौरान जो विपक्ष राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान 'वंदे मातरम्' और 'जय हिंद' नारे लगाने से रोकने वाले बुलेटिन का विरोध कर रहा था, वह फिर से विरोध की स्थिति में आ गया। वहीं, अब जब सरकार ने राष्ट्रीय गीत के सभी छंदों के साथ गाए जाने के अनिवार्य कर दिया है तो एक बार फिर वैसा ही विरोध का माहौल देखने को मिल रहा है।

सरकार ने विपक्ष को उसी की चाल में फंसाया!

राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो राज्यसभा 'वंदे मातरम्' को लेकर राज्यसभा बुलेटिन में जारी किए गए निर्देशों का विरोध हुआ ममता बनर्जी ने इसे बंगाल की अस्मिता से जोड़ा तो भाजपा को चुनावी नुकसान का आभास होने लगा। जिसके बाद पीएम मोदी और भाजपा ने 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान के रूप में न अपनाए जाने और उसमें काट-छांट को मुद्दा बनाते हुए विपक्ष को उसी की चाल में फंसा लिया।

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वंदे मातरम राजनीतिक विवाद (AI जनरेटेड)

पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले सरकार ने इसके गायन को सभी छंदों और धुन के साथ अनिवार्य करते हुए बंगाल में सियासी बाजी पलटने की कोशिश की है। जिसके बाद यह माना जा रहा था कि अगर टीएमसी सरकार के इस फैसले का विरोध करती है तो भाजपा चुनाव में इसे मुद्दा बनाकर उसके ही खिलाफ इस्तेमाल करेगी।

टीएमसी ने निकाली नए दांव की नई काट!

हालांकि, टीएमसी ने बहुत ही संतुलित तरीके से विरोध दर्ज करा दिया है। टीएमसी की राज्यसभा सांसद डोला सेन ने बीजेपी पर पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले इतिहास बदलने का आरोप लगाया है। सेन ने कहा बीजेपी का आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं रहा है। यह सब बंगाल चुनाव को देखते हुए किया जा रहा है।

'वंदे मातरम्' की बिसात पर किसे मिलेगी मात?

डोला सेन ने आगे कहा कि 'वंदे मातरम्' पहले दो अंतरे रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर अपनाए गए थे और गाए गए थे। टैगोर के फैसले को बदलने वाले मोदी और शाह कौन होते हैं? बंगाल की जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। फिलहाल टीएमसी ने 'वंदे मातरम्' के पुराने प्रारूप को टैगौर से जोड़कर इस लड़ाई को अलग मोड़ दे दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि वंदे मातरम् के मुद्दा बंगाल चुनाव में कौन बेहतर तरीके से भुनाता है और इस सियासी बिसात पर कौन विजयश्री हासिल करता है।

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