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हवाईजहाज के लिए खतरा है ज्वालामुखी की राख, हवा में मौत का ताबूत बन सकता है प्लेन, पहले भी हुआ है ऐसा
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
Aeroplanes के लिए ज्वालामुखी की राख एक सूक्ष्म, अदृश्य खतरा है। 1400 डिग्री सेल्सियस पर पिघलकर यह इंजन बंद कर सकती है। जानिए इसके पहले कब ऐसे हादसे हुए हैं जब हजारों फीट उपर लोगों की जान पर बन आई।

प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया
Volcanic ash Impact on Airplanes: हाल ही में इथियोपिया में ज्वालामुखी फटने के बाद राख को लेकर चेतावनी जारी हुई है। ज्वालामुखी की राख हवाई जहाज के इंजन को बंद कर सकती है। यह सूक्ष्म राख इंजन के लिए सबसे खतरनाक जोखिम पैदा करती है, जो नग्न आँखों से दिखाई भी नहीं देती।
ज्वालामुखी की राख का कण इंजन के अंदर जाकर कंबस्टर तक पहुंचता है। वहां का तापमान लगभग 1,400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जहां राख पिघल जाती है। यह पिघली हुई राख ठंडी होकर कांच जैसा सिलिकेट सीमेंट बन जाती है और यह टर्बाइन और नॉजल जैसे इंजन के महत्वपूर्ण पुर्जों को चिपका देती है। जब इंजन के पुर्जे इस ठोस परत से ढक जाते हैं, तो इंजन का प्रवाह रुक जाता है और वह बंद हो सकता है। इसके अलावा, यह राख कंप्रेशर ब्लेडों को भी बर्बाद कर देती है। यह कॉकपिट विंडशील्ड और सेंसर्स को भी खराब कर देती है। यही वजह है कि विमानन कंपनियां ज्वालामुखी की राख को बेहद गंभीरता से लेती हैं।
जब 37,000 फीट पर बंद हुए चारों इंजन
ऐसे खतरों का सबसे भयावह उदाहरण 24 जून 1982 को देखने को मिला था। एक ब्रिटिश एयरवेज (British Airways) का बोइंग 747 विमान कुआलालंपुर से पर्थ जा रहा था। यह विमान माउंट गालुंगगुंग ज्वालामुखी की राख के बादल में चला गया। उस समय 247 यात्री सवार थे। यह विमान 37,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था, जब इसके चारों इंजन बंद हो गए।
यात्री घबरा गए थे। हालांकि, क्रू सदस्यों ने बेहतरीन सूझबूझ का परिचय दिया। इंजन को फिर से चालू करने में करीब 15 मिनट का समय लगा। तब तक विमान 12,000 फीट नीचे आ चुका था। यह घटना दुनिया भर में हवाई सुरक्षा इतिहास में दर्ज है।
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अलास्का में माउंट रेडाउट ज्वालामुखी फटा
1989 में ऐसा ही एक बड़ा हादसा टल गया था। अलास्का के माउंट रेडाउट ज्वालामुखी के फटने के सिर्फ एक दिन बाद, केएलएम का बोइंग 747 विमान एम्स्टर्डम से टोक्यो की ओर जा रहा था। उड़ान के बीच अचानक उसके चारों इंजन एक साथ बंद हो गए। इंजन बंद होते ही विमान लगभग 4,000 मीटर नीचे आ गया। हालांकि, इंजन ठंडे पड़ते ही पायलट उन्हें दोबारा चालू करने में सफल रहा और विमान को सुरक्षित रूप से एंकरेज में उतार लिया गया।
वैश्विक निगरानी से मिली सुरक्षा
1980 और 1990 के दशक की इस तरह की दुर्घटनाओं के बाद, विमानन सुरक्षा नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। अब पूरी दुनिया में ज्वालामुखी राख सलाह केंद्र (VAACs) हैं। ये केंद्र ज्वालामुखी गतिविधियों की निरंतर निगरानी करते हैं और राख के बादलों की दिशा और गति पर नजर रखते हैं।
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जब आसमान में राख मिलती है, तो उड़ान मार्गों को तुरंत बदल दिया जाता है। हालांकि, कम मात्रा में राख भी नुकसान पहुंचा सकती है। अगर विमान किसी संभावित राख वाले क्षेत्र में घुस जाता है, तो इंजन को तुरंत बंद करना अनिवार्य कर दिया गया है।
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