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‘स्कूलों में वंदे मातरम जरूरी नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका; कहा- क्यों करें सुनवाई
- Written By: सजल रघुवंशी
Supreme Court Of India: सुप्रीम कोर्ट ने 'वंदे मातरम' गाने वाली सरकारी एडवाइजरी के खिलाफ लगी याचिका को खारिज कर दिया है। सीजेआई की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

सर्वोच्च न्यायालय (सोर्स- आईएएनएस)
Vande Mataram Advisory: सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों और सरकारी संस्थानों में रोज ‘वंदे मातरम’ गाने को अनिवार्य बनाने वाले केंद्र सरकार के सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह याचिका अभी समय से पहले दायर की गई है (प्री-मैच्योर)। कोर्ट के अनुसार, जब तक सरकार के इस निर्देश से किसी के साथ वास्तविक भेदभाव या समस्या सामने नहीं आती, तब तक इस मामले पर सुनवाई करने का कोई मतलब नहीं है।
साथ ही जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम.पंचोली की बेंच ने इस याचिका को समय से पहले करार दिया। साथ ही बेंच ने यह भई कहा कि इन दिशानिर्देशों का पालन न करने पर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल गाइडलाइंस हैं और इनमें किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है। इसका मतलब है कि किसी को भी ‘वंदे मातरम’ गाने या बजाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। बेंच ने आगे कहा इन मामलों पर सुनवाई तब होगी जब इन निर्देशों का पालन न करने पर किसी तरह की सजा दी जाए या इसे पूरी तरह अनिवार्य बना दिया जाएगा। फिलहाल यह सिर्फ एक एडवाइजरी है, जिसमें किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।
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‘जबरदस्ती लागू नहीं हो सकती देशभक्ति’
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार मोहम्मद सईद नूरी नाम के व्यक्ति ने यह याचिका दाखिल की थी और इस मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में सीजेआई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच कर रही थी। बताया जा रहा है कि सईद नूरी एक शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं और उनकी ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि भले ही यह नियम सिर्फ सलाह के तौर पर हों लेकिन सामाजिक दबाव के कारण लोग इन्हें मानने के लिए मजबूर हो सकते हैं। उनका कहना था कि देशभक्ति को जबरदस्ती लागू नहीं किया जा सकता।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर उठे सवाल
संजय हेगड़े ने दलील दी कि यह मामला व्यक्ति की स्वतंत्रता और अंतरात्मा के अधिकार से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति ‘वंदे मातरम्’ गाने से इनकार करता है, तो उसे मानसिक और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी आशंका जताई कि एडवाइजरी के नाम पर लोगों को जबरन साथ गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
वहीं, जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि क्या इन दिशानिर्देशों का पालन न करने पर वास्तव में कोई सजा का प्रावधान है। उन्होंने पूछा कि क्या 28 जनवरी की अधिसूचना के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है? क्या ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर किसी को कार्यक्रम या सभा से बाहर किया जाता है?
सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा सवाल?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उन्हें राष्ट्र गीत बजाने के लिए किसी तरह से मजबूर किया जा रहा है? CJI ने कहा कि हमें वह नोटिस दिखाइए, जो आपको भेजा गया हो और जिसमें आपको राष्ट्र गीत बजाने के लिए मजबूर किया गया हो। आप एक स्कूल चलाते हैं हमें यह भी नहीं पता कि आपका स्कूल मान्यता प्राप्त है या नहीं।
यह भी पढ़ें: तुष्टिकरण से नहीं, समानता से चलेगा देश, गुजरात में UCC लागू होते ही बोले अमित शाह; विपक्ष पर साधा निशाना
एडवाइजरी में ‘MAY’ शब्द का इस्तेमाल
जस्टिस बागची ने बताया कि इन दिशानिर्देशों में ‘may’ (सकते हैं) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। जिससे साफ है कि यह अनिवार्य नहीं बल्कि सिर्फ एक सलाह है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की गाइडलाइंस के क्लॉज 5 में ‘may’ शब्द यह दर्शाता है कि गाना या न गाना दोनों ही विकल्प लोगों के लिए खुले हैं यानी इसमें किसी पर दबाव नहीं डाला जा रहा।
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