बच गए माई लॉर्ड...राज्यसभा में खारिज तो लोकसभा में महाभियोग नहीं? जस्टिस वर्मा केस में क्या बोला SC

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के महाभियोग से जुड़े केस में बुधवार की सुनवाई के दौरान एक बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल गूंजता हुई सुनाई पड़ा।
Justice Yashwant Verma impeachment Case: बच गए 'माई लॉर्ड'...राज्यसभा में खारिज तो लोकसभा में महाभियोग नहीं? जस्टिस यशवंत वर्मा केस में क्या बोला सुप्रीम कोर्ट
कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Published on
Updated on

Justice Yashwant Verma impeachment Case: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम कानूनी और संवैधानिक सवाल पर सुनवाई की। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के महाभियोग से जुड़ा है। कोर्ट ने इस धारणा पर गंभीर सवाल उठाए हैं कि अगर संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो जाता है, तो क्या लोकसभा में स्वीकार किया गया प्रस्ताव भी अपने आप विफल मान लिया जाएगा? जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने इस जटिल मुद्दे पर अपनी चिंता और संदेह व्यक्त किया है।

यह सुनवाई जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर हो रही थी जिसमें उन्होंने लोकसभा स्पीकर के फैसले को चुनौती दी है। स्पीकर ने उनके खिलाफ महाभियोग जांच के लिए 'जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट' के तहत तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। जस्टिस वर्मा का तर्क है कि यह प्रक्रिया कानूनन सही नहीं है क्योंकि स्पीकर ने एकतरफा फैसला लिया। उन्होंने अपनी याचिका में जोर देकर कहा है कि जब दोनों सदनों में नोटिस दिए गए थे, तो राज्यसभा के सभापति द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने का इंतजार किए बिना समिति बनाना नियमों का उल्लंघन है।

क्या स्पीकर का फैसला गलत था?

सुनवाई के दौरान अदालत में जोरदार बहस देखने को मिली। जस्टिस वर्मा की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट के सामने कानूनी बारीकियों को रखा। उन्होंने तर्क दिया कि 'जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट' की धारा 3 के प्रावधान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ऐसे मामलों में जहां महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में उठाया जाता है, वहां लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन के बीच संयुक्त परामर्श होना अनिवार्य है।

मुकुल रोहतगी ने दी अहम दलील

रोहतगी का कहना था कि कानूनन इस परामर्श के बाद ही किसी जांच समिति का गठन किया जा सकता है। चूंकि इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, इसलिए पूरी जांच प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि लोकसभा स्पीकर ने राज्यसभा की कार्यवाही का इंतजार किए बिना एकतरफा कदम उठाया, जो जस्टिस वर्मा के अधिकारों का हनन है।

लोकसभा महासचिव ने क्या कहा?

मुकुल रोहतगी की इस दलील के जवाब में लोकसभा के महासचिव ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि संयुक्त परामर्श का नियम इस मामले में लागू ही नहीं होता। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार ही नहीं किया था। जब दूसरे सदन में प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं हुआ, तो फिर दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों के बीच चर्चा का कोई आधार नहीं बचता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने उठाया सवाल

इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने पूछा कि अगर एक सदन में प्रस्ताव विफल हो जाता है और उसी दिन दूसरे सदन में वह सफल हो जाता है, तो क्या सफल प्रस्ताव भी अपने आप गिर जाएगा? उन्होंने कहा कि कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं दिखता जो यह कहता हो कि एक सदन द्वारा खारिज किए जाने पर दूसरा सदन आगे नहीं बढ़ सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संयुक्त जांच समिति तभी बनती है जब दोनों सदन प्रस्ताव स्वीकार करें।

Justice Yashwant Verma impeachment infographic
जस्टिस यशवंत वर्मा महाभियोग केस इन्फोग्राफिक (AI जनरेटेड एंड मोडिफाइड)

जस्टिस दत्ता ने कानून की अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हमें कानून की 'उद्देश्यपूर्ण व्याख्या' करनी होगी ताकि संसद की मंशा को सही तरीके से समझा जा सके। उन्होंने शुरुआती तौर पर संकेत दिया कि वह इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि राज्यसभा में प्रस्ताव के गिर जाने से लोकसभा का प्रस्ताव अपने आप निरस्त हो जाएगा। यह टिप्पणी मामले की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है।

सर्वोच्च अदालत में हुई तीखी बहस

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक सीधा सवाल पूछा कि क्या राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव वास्तव में स्वीकार किया गया था या नहीं? इस पर मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि राज्यसभा के सभापति ने प्रस्ताव की प्राप्ति को स्वीकार किया था और यह भी कहा था कि जजेज (इन्क्वायरी) एक्ट की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

मुकुल रोहतगी ने दिया महत्वपूर्ण तर्क

रोहतगी ने इसे 'अप्रत्यक्ष स्वीकृति' (implied admission) करार दिया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या उपसभापति के पास यह अधिकार है कि वह सभापति के फैसले की समीक्षा कर सकें? उनका कहना था कि प्रक्रियागत खामियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सॉलिसिटर जनरल ने किया विरोध

इस पर सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रोहतगी की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्यसभा के सभापति ने न तो प्रस्ताव को स्वीकार किया था और न ही खारिज किया था। वे केवल यह जांचना चाहते थे कि क्या उसी दिन लोकसभा में भी ऐसा ही कोई प्रस्ताव लाया गया है। मेहता ने कहा कि इसे स्वीकृति मान लेना गलत होगा।

गुरुवार को भी जारी रहेगी सुनवाई

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह गुरुवार को भी सुनवाई जारी रखेगा। कोर्ट अब मुख्य रूप से यह जांच करेगा कि जांच समिति गठित करने से पहले लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति के बीच परामर्श न होने से क्या वाकई जस्टिस यशवंत वर्मा के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है? बेंच ने साफ किया कि उन्हें सिर्फ यह देखना है कि क्या इस मामले में कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं।

फिलहाल जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला न्यायपालिका और संसद के बीच की प्रक्रियाओं को समझने के लिहाज से बेहद अहम हो गया है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस केस में कल यानी गुरुवार 8 जनवरी 2026 की सुनवाई में क्या कुछ होने वाला है?

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com