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Rajesh Pilot Birth Anniversary: दूध बेचने वाले राजेश्वर कैसे बने देश के ‘निडर’ पायलट? जानें अनसुने किस्से
Rajesh Pilot: भारतीय राजनीति के दिग्गज नेता राजेश पायलट की आज 81वीं जयंती है। किसान परिवार में जन्मे राजेश्वर के किसानों के मसीहा बनने और दूध बेचने से लेकर आसमान नापने तक का सफर बेहद प्रेरणादायक है।
- Written By: प्रतीक पांडेय

राजेश पायलट, फोटो- नवभारत डिजाइन
Congress leader Rajesh Pilot Birth Anniversary: भारतीय राजनीति में ‘किसानों के मसीहा’ के रूप में पहचान बनाने वाले पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट का आज जन्मदिन है। 10 फरवरी 1945 को जन्मे राजेश पायलट एक ऐसे विरले नेता थे, जिन्होंने कभी मंत्रियों के घरों में दूध पहुंचाया, लेकिन अपनी मेहनत और निडरता के दम पर उसी संसद और मंत्रिमंडल में उच्च पदों तक पहुंचे।
राजेश पायलट का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के बैदपुरा गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम राजेश्वर प्रसाद बिधूरी था। उनका बचपन कड़े संघर्षों में बीता; वे स्कूल जाने से पहले मंत्रियों के घरों में दूध बांटने का काम करते थे और मेरठ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के दौरान भी उन्होंने यह काम जारी रखा। लेकिन उनके सपने आसमान छूने के थे। कड़ी मेहनत के बाद 29 अक्टूबर 1966 को वे भारतीय वायुसेना में बतौर फ्लाइंग ऑफिसर कमीशन हुए। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और 13 साल तक देश की सेवा की।
₹2 के स्टाम्प पेपर ने बदला नाम: ‘राजेश्वर’ से ‘राजेश पायलट’ का सफर
राजेश पायलट का राजनीति में प्रवेश इंदिरा गांधी और संजय गांधी के सानिध्य में हुआ। 1980 में जब वे पहली बार भरतपुर से चुनाव लड़ने पहुँचे, तो क्षेत्र में चर्चा थी कि इंदिरा गांधी ने किसी ‘पायलट’ को भेजा है। जब उन्होंने नामांकन फॉर्म में अपना नाम ‘राजेश्वर प्रसाद बिधूरी’ लिखा, तो उनके एक समर्थक ने टोकते हुए कहा कि जनता आपको इस नाम से नहीं, बल्कि सिर्फ ‘पायलट’ के नाम से जानती है। तब उन्होंने तुरंत 2 रुपये के स्टाम्प पेपर पर हलफनामा देकर अपना नाम बदलकर ‘राजेश पायलट’ कर लिया। इसके बाद वे लगातार 20 साल तक सांसद रहे और राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
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निडर नेता और ‘किसानों के मसीहा’
राजेश पायलट अपनी बेबाकी और निडरता के लिए जाने जाते थे। वे अक्सर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री के लिए भी कभी-कभी संकट खड़ा कर देते थे, अगर बात किसानों या जनहित की होती थी। वे खुद को ‘हवाई नेता’ कहलाना पसंद करते थे क्योंकि उन्हें फ्लाइंग का शौक था और वे जनसभाओं के लिए देशभर में उड़ानें भरते थे।
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उनका मानना था कि जब तक किसान और मजदूर का बेटा उन कुर्सियों पर नहीं बैठेगा जहां देश की नीतियां बनती हैं, तब तक सही विकास संभव नहीं है। उनकी सादगी का आलम यह था कि वे अक्सर गांवों के रास्तों और चाय की थड़ियों पर बैठकर ही जनसुनवाई कर लिया करते थे।
जब किस्मत ने दिया साथ: मौत को कई बार दी मात
राजेश पायलट के जीवन में मौत के साथ लुका-छिपी के कई किस्से हैं। 23 जून 1980 को जब संजय गांधी का प्लेन क्रैश हुआ, उस दिन संजय ने उन्हें भी साथ बुलाया था। लेकिन किस्मत देखिए, उस सुबह न उनका ड्राइवर मिला, न उनका स्कूटर स्टार्ट हुआ और न ही उन्हें टैक्सी मिली। इस देरी की वजह से वे एयरपोर्ट नहीं पहुंच सके और उनकी जान बच गई।
हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था। 11 जून 2000 को जयपुर-आगरा हाईवे पर एक भीषण सड़क हादसे में उनका निधन हो गया।, बताया जाता है कि उस दिन एक रहस्यमयी फोन कॉल की वजह से उन्होंने अपना ट्रेन से जाने का प्लान बदलकर कार से जयपुर जाने का फैसला किया था, जो उनकी आखिरी यात्रा साबित हुई।
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