
कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा व मोहन भागवत (फोटो- सोशल मीडिया)
Pradeep Mishra RSS statement: मशहूर कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने सियासी और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है। भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने संघ की तुलना सीधे भगवान शिव से कर दी। उन्होंने कहा कि जिस तरह महादेव ने पूरी सृष्टि को बचाने के लिए हलाहल विष पी लिया था, ठीक उसी तरह संघ भी रोज अपमान और आरोपों का कड़वा जहर पीकर राष्ट्र की रक्षा में पूरी निष्ठा से जुटा हुआ है।
पंडित मिश्रा के इस बयान के बाद सियासी चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। अभी हाल ही में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी भाजपा और संघ के संगठन की तारीफ की थी और अब प्रदीप मिश्रा के इस बयान को उसी बात पर मुहर माना जा रहा है। मिश्रा ने स्पष्ट किया कि संघ और शिव के भाव में एक अद्भुत समानता है। संघ के कार्यकर्ता हर दिन आलोचनाओं का सामना करते हैं, लेकिन वे संयम नहीं खोते और बिना किसी शिकायत के देशहित में अपना काम जारी रखते हैं। उनका कहना था कि यह संयम ही उन्हें शिव के करीब लाता है।
इसी कार्यक्रम के दौरान भोपाल के शिवनेरी भवन और कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित ‘स्त्री शक्ति संवाद’ में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी समाज की दुखती रग पर हाथ रखा। लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसे रोकने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है, बल्कि इसकी रोकथाम का पहला स्तर हमारा अपना परिवार होना चाहिए। भागवत ने सवाल उठाया कि हमें सोचना होगा कि आखिर हमारे घर की बेटियां बहकावे में क्यों आ रही हैं? इसका सबसे बड़ा कारण परिवारों में आपसी संवाद की कमी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के कारण ही सुरक्षित है, इसलिए समाज की संस्थाओं को भी सतर्क रहकर सामूहिक रूप से इसका मुकाबला करना होगा।
सामाजिक सद्भाव सम्मेलन में मोहन भागवत ने उस विमर्श को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें जनजातीय समाज को मुख्यधारा से अलग बताया जाता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जनजातीय समाज और तथाकथित मुख्यधारा के बीच विभाजन का विचार पूरी तरह कृत्रिम और बनावटी है। हजारों सालों से इस पावन धरती पर रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक ही है।
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विविधता में एकता ही भारत की असली पहचान है। उन्होंने समझाया कि हिंदू कोई पंथ, लेबल या महज एक संज्ञा नहीं है, बल्कि यह एक स्वभाव है जो पूजा-पद्धति या जीवनशैली के आधार पर किसी से झगड़ा नहीं करता। उन्होंने नसीहत दी कि समाज को भ्रमित करने वालों से सावधान रहें और समर्थ लोगों को हमेशा कमजोर की मदद करनी चाहिए। संकट ही नहीं, बल्कि हर समय आपस में मेल-जोल और संवाद बनाए रखना ही सद्भावना की पहली शर्त है।






