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मीडिया ट्रायल पर मुकुल रोहतगी की चेतावनी, ‘जस्टिस यशवंत वर्मा बरी भी हुए, तो नहीं मानेगा कोई ईमानदार’
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
Justice Yashwant Varma Case: पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने मीडिया ट्रायल को न्यायिक गरिमा के लिए खतरा बताया। उन्होंने कहा कि नकारात्मक कवरेज से जजों का करियर/सम्मान हमेशा के लिए खत्म हो जाता है

मुकुल रोहतगी, फोटो- सोशल मीडिया
Mukul Rohatgi Media Trial: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मुख्यधारा के मीडिया द्वारा चलाए जा रहे ‘मीडिया ट्रायल’ पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले का उदाहरण देते हुए आगाह किया कि टीवी चैनलों पर बार-बार दिखाए जाने वाले आरोपों से अदालत के फैसले से पहले ही व्यक्ति की छवि धूमिल हो जाती है।
भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने 16 जनवरी को आयोजित एक पुस्तक विमोचन के दौरान मीडिया ट्रायल को देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक करार दिया। उनका मानना है कि मीडिया ट्रायल में किसी भी न्यायाधीश की पूरी न्यायिक यात्रा को हमेशा के लिए समाप्त कर देने की विनाशकारी क्षमता होती है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यदि किसी जज के खिलाफ लंबे समय तक नकारात्मक कवरेज चलती है, तो अदालत द्वारा भविष्य में मिलने वाली क्लीन चिट या बरी होने का आदेश भी उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता जो समाज में उनकी छवि को पहले ही हो चुका होता है।
जस्टिस यशवंत वर्मा केस का हवाला और करियर पर प्रभाव
रोहतगी ने जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने एक ऐसे जज के मामले का जिक्र किया (संभवतः जस्टिस वर्मा के संदर्भ में), जिनके घर से कथित रूप से पैसा मिलने की बातें मीडिया में फैलाई गईं। रोहतगी ने कहा कि पूरे मीडिया ने उन्हें “काला रंग” दिया है और अब स्थिति ऐसी है कि यदि वे अंत में निर्दोष भी साबित हो जाते हैं, तब भी कोई उन्हें एक ईमानदार जज के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केस का नतीजा चाहे जो भी हो, संबंधित व्यक्ति का पेशेवर करियर पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। उल्लेखनीय है कि रोहतगी ने जस्टिस वर्मा की ओर से उस याचिका की पैरवी की थी, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति को चुनौती दी गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में खारिज कर दिया है।
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सोशल मीडिया से अधिक खतरनाक है मुख्यधारा का मीडिया
एक तुलना करते हुए मुकुल रोहतगी ने कहा कि सोशल मीडिया की तुलना में मुख्यधारा का मीडिया (TV चैनल्स और अखबार) कहीं अधिक खतरनाक है। इसका कारण यह है कि मुख्यधारा के मीडिया को समाज में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। उन्होंने टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले दृश्यों और आरोपों की पुनरावृत्ति की आलोचना करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की शक्ल टीवी पर लाखों बार दिखाकर उसे ‘गैंगस्टर’ कहना सोशल मीडिया से कहीं अधिक तबाही मचाता है। यह प्रक्रिया अदालत द्वारा साक्ष्यों की जांच करने से पहले ही एक प्रकार का ‘तत्काल न्याय’ का माहौल पैदा कर देती है, जो निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।
विशेष ट्रिब्यूनल के विचार को दी कड़ी प्रतिक्रिया
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) का सम्मान करते हुए भी रोहतगी ने कहा कि मीडिया अपनी सीमाओं को लांघकर निजता और गरिमा के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि, उन्होंने मीडिया के नियमन के लिए किसी विशेष ट्रिब्यूनल के गठन के सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया। उनके अनुसार, भारत में ‘ट्रिब्यूनलीकरण’ एक विफल प्रयोग रहा है क्योंकि इन निकायों में संवैधानिक सुरक्षा का अभाव होता है और ये कार्यपालिका के प्रभाव में आ सकते हैं। उन्होंने उच्च न्यायालयों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र और सक्षम विकल्प बताया।
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न्यायिक सोच पर मीडिया नैरेटिव का प्रभाव
जस्टिस यशवंत वर्मा के घटना की इस चर्चा में वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सिवल बिलीमोरिया ने भी मीडिया द्वारा गढ़ी गई झूठी कहानियों के न्यायिक फैसलों पर पड़ने वाले असर की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने आवारा कुत्तों से जुड़े एक मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि बार-बार की मीडिया रिपोर्टिंग से जजों के मन में यह गलत धारणा घर कर गई है कि कुत्ते नियमित रूप से बच्चों को मार रहे हैं, जबकि यह पूरी सच्चाई नहीं है। बिलीमोरिया ने जजों को चेतावनी दी कि उन्हें अदालत के बाहर चल रही ‘कथाओं’ (Narratives) के आधार पर फैसले देने से बचना चाहिए, क्योंकि एल्गोरिद्म-आधारित प्रसार से अप्रमाणित दावे भी अब स्थापित तथ्य जैसे लगने लगे हैं।
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