मणिपुर हिंसा: इंसाफ की आस में थमीं गैंगरेप पीड़िता की सांसें; ढाई साल बाद भी सीबीआई के हाथ खाली, प्रदर्शन तेज

Manipur Violence: मणिपुर में 2023 की हिंसा के दौरान सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हुई कुकी समुदाय की युवती की गुवाहाटी में मौत हो गई। ढाई साल बाद भी जांच एजेंसियां आरोपियों को पकड़ने में नाकाम रही हैं।
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मणिपुर में मोमबत्ती लेकर किया गया प्रदर्शन, फोटो- सोशल मीडिया
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Manipur Gang Rape Victim Died: मणिपुर में जातीय संघर्ष की आग ने न जाने कितने मासूमों की जिंदगी झुलसा दी है। इन्हीं में से एक थी 18 वर्षीय कुकी युवती, जिसने 2023 में नृशंस गैंगरेप का दंश झेला। ढाई साल तक शारीरिक और मानसिक घावों से लड़ते हुए, आखिरकार उसने गुवाहाटी के अस्पताल में दम तोड़ दिया। विडंबना यह है कि उसकी मौत के बाद भी उसके गुनहगार कानून की पहुंच से दूर हैं।

मणिपुर में साल 2023 की शुरुआत में भड़की जातीय हिंसा के दौरान इस मानवता को शर्मसार करने वाली घटना को अंजाम दिया गया था। पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया था कि कुछ हथियारबंद लोगों ने उसे एक सफेद कार में अगवा किया और एक अज्ञात पहाड़ी इलाके में ले गए। वहां उसके साथ बार-बार सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (ITLF) के आरोपों के अनुसार, इस अपहरण में महिलाओं के एक समूह, जिन्हें 'मीरा पैबी' कहा जाता है, ने भूमिका निभाई थी। आरोप है कि इन महिलाओं ने युवती को अगवा कर 'आरामबाई टेंगोल' के सदस्यों को सौंप दिया था जिन्होंने लैंगोल ले जाकर उसका यौन उत्पीड़न किया और बाद में उसे विष्णुपुर जिले में अधमरा छोड़ दिया।

राहत शिविरों से गुवाहाटी तक लड़ी जंग

इस क्रूर हमले में युवती को न केवल गहरा मानसिक सदमा पहुंचा, बल्कि उसे गंभीर शारीरिक चोटें भी आईं। घटना के बाद उसे शुरुआत में कांगपोकपी जिले के राहत शिविरों में रखा गया। हालत में सुधार न होने पर उसे मणिपुर और नागालैंड के विभिन्न अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाया गया। अंततः बेहतर चिकित्सा के लिए उसे असम के गुवाहाटी शिफ्ट किया गया, जहां 10 जनवरी को उपचार के दौरान उसने अंतिम सांस ली। परिजनों का कहना है कि वह उस खौफनाक हादसे के सदमे से कभी उबर नहीं पाई थी और उसकी शारीरिक चोटें भी पूरी तरह ठीक नहीं हो सकीं।

ढाई साल बाद भी कोई सुराग नहीं, सीबीआई के हाथ खाली

न्याय की धीमी प्रक्रिया इस मामले में सबसे बड़ा दर्द बनकर उभरी है। युवती ने 21 जुलाई 2023 को पुलिस में अपनी शिकायत दर्ज कराई थी, जिसे एक महीने के भीतर ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया था। हालांकि, कुछ रिपोर्टों के अनुसार अपहरण की घटना तीन साल पहले की बताई जा रही है, लेकिन जांच में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि मामला दर्ज है, लेकिन अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी या पहचान के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है। जांच की इस सुस्त रफ्तार ने सिस्टम और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मौत के बाद विरोध और तेज

एक बयान में इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (आईटीएलएफ) ने कहा, “उनकी मौत इस बात की एक और दर्दनाक गवाही है कि किस तरह कूकी-जो समुदाय को बेरहमी से निशाना बनाया गया।” आईटीएलएफ ने कहा कि कूकी-जो लोगों के पास अब “अपनी सुरक्षा, सम्मान और अस्तित्व के लिए अलग प्रशासन की मांग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।”

कोई अन्य कोशिश न्याय से इनकार के बराबर

कूकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (केएसओ) ने आरोप लगाया कि अपराध की गंभीरता और नागरिक समाज संगठनों की बार-बार अपील के बावजूद आरोपियों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। केएसओ ने कहा, “हम स्पष्ट रूप से यह मांग करते हैं कि उनकी मौत को आधिकारिक तौर पर वर्ष 2023 में उनके साथ हुई हिंसा का परिणाम माना जाए। इसके विपरीत कोई भी कोशिश न्याय से इनकार और जिम्मेदारी मिटाने के समान होगी।”

कूकी महिलाओं के एक संगठन ने कहा कि पीड़िता को केवल उसके साथ हुए अन्याय के लिए ही नहीं, बल्कि अत्यंत क्रूरता के सामने उसके साहस के लिए भी याद किया जाएगा। कूकी-जो विमेंस फोरम, दिल्ली एवं एनसीआर ने अपने बयान में कहा, “करीब तीन वर्षों तक उसने ऐसा दर्द सहा, जिसे किसी भी इंसान को कभी नहीं झेलना चाहिए।”

मणिपुर में वर्तमान में राष्ट्रपति शासन लागू है, लेकिन राज्य में हुई जातीय हिंसा के जख्म अब भी हरे हैं। हिंसा के उस दौर में हजारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह युवती उसी हिंसा का एक ऐसा चेहरा बन गई है, जिसने सिस्टम से इंसाफ मांगते-मांगते दम तोड़ दिया। कुकी समुदाय और मानवाधिकार संगठनों में इस घटना को लेकर गहरा रोष है कि एक पीड़िता की मौत हो गई, लेकिन ढाई साल बीत जाने के बाद भी कानून के हाथ आरोपियों की गिरेबान तक नहीं पहुंच पाए हैं।

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