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जयंती विशेषः गांधी ने कहा लौह पुरुष, बाड़दौली आंदोलन से मिली सरदार की उपाधि, वल्लभ भाई पटेल को बिस्मार्क कहना क्यों है तौहीन?
भारत का वह राजनेता और स्वतंत्रता सैनानी जिसकी सादगी और मजबूत इरादों के लोग कायल थे। जिसे राष्ट्रपिता माहत्मा गांधी ने लौह पुरुष कहा और गुजरात की महिलाओं ने सरदार की उपाधि दी। आज उस महान सख्सियत की जयंती है। जिसे हम सब सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम से जानते हैं।
- Written By: Saurabh Pal

जयंती विशेष सरदार वल्लभ भाई पटेल (डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्कः भारत का वह राजनेता और स्वतंत्रता सैनानी जिसकी सादगी और मजबूत इरादों के लोग कायल थे। जिसे राष्ट्रपिता माहत्मा गांधी ने लौह पुरुष कहा और गुजरात की महिलाओं ने सरदार की उपाधि दी। आज उस महान सख्सियत की जयंती है। जिसे हम सब सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम से जानते हैं। आजादी के बाद सैकड़ों रियासतों में बंटे भारत को एक करना लोहे के चने चबाने जैसा था, तब लौहपुरूष ने अपने कंधो पर भारत के एकीकरण की जिम्मेदारी उठाई। उन्होंने भारत की 562 रियासतों को एक करके पूरी दुनियां को चौका दिया। इसके बाद उन्हें भारत का बिस्मार्क कहा जाने लगा, लेकिन सरदार वल्लभ भाई की उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें बिस्मार्क कहना उनकी तौहीन है। क्योंकि बिस्मार्क ने सिर्फ 39 राज्यों का एकीकरण किया था।
आज हम जिस विशाल भारत को देखते हैं, उसकी कल्पना भी सरदार वल्लभ भाई पटेल के बिना नहीं की जा सकती थी। आचार्य विष्णुगुप्त ( चाणक्य) के बाद यदि किसी ने संपूर्ण भारत के एकीकरण का स्तुत्य प्रयास किया तो वह लौह-पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल ही थे। सरदार पटेल ने आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरदार वल्लभभाई पटेल: भारत के लौह पुरुष
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सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। उन्हें भारत के ‘लौह पुरुष’ के रूप में जाना जाता है, उन्होंने देश को एक मजबूत नेतृत्व प्रदान किया। सरदार पटेल का जीवन संघर्ष, साहस और सेवा का प्रतीक रहा। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आजाद भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में भारतीय गणराज्य की नींव रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
वल्लभभाई पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उनके जीवन की शुरुआत साधारण परिस्थितियों में हुई, लेकिन उनमें प्रारंभ से ही दृढ़ निश्चय और आत्मनिर्भरता के गुण थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लंदन जाकर कानून की पढ़ाई की और भारत वापस लौटकर वकालत का कार्य प्रारंभ किया, लेकिन उनकी असल पहचान स्वतंत्रता संग्राम में मिली, जब उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश की सेवा में अपने जीवन को समर्पित कर दिया।
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स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
सरदार पटेल ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। वे महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे और असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, तथा भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। उनके संगठनात्मक कौशल और दृढ़ नेतृत्व ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक प्रमुख स्थान दिलाया।
वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली सत्याग्रह जैसे आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बारडोली सत्याग्रह में किसानों पर लगान बढ़ाने के विरोध में किए गए आंदोलन के सफल नेतृत्व के कारण उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा गया। इस आंदोलन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण नेता बना दिया।
सरदार पटेल के सम्मान में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का हुआ निर्माण
सरदार पटेल की जयंती पर उन्हें सम्मानित करने के लिए गुजरात में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का निर्माण किया गया है, जो विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है। यह प्रतिमा उनके योगदान और अखंड भारत के उनके सपने का प्रतीक है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने एक मजबूत और अखंड भारत का सपना देखा और उसे साकार करने के लिए अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया। उनकी नेतृत्व क्षमता, साहस, और एकता की भावना ने भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाया। भारतीय इतिहास में सरदार पटेल का नाम सदा अद्वितीय रहेगा, और उनके आदर्श हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।
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