Explainer: 3 साल 8 दिन का कार्यकाल...और अब इस्तीफा, कलह और कुर्सी की खींचतान में उलझकर रह गए सिद्धारमैया?

Karnataka Political Crisis: सिद्धारमैया के इस्तीफे के साथ कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से जारी सियासी उठापटक भले ही नया मोड़ ले लिया हो, लेकिन यह पूरी तरह से खत्म होता नजर नहीं आ रहा है।
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कर्नाटक का सियासी नाटक, (सोर्स- AI)
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Karnataka Political Crisis: कर्नाटक में लंबे समय से जारी सियासी उथल-पुथल अब नई रूप लेने जा रही है। दिल्ली के इंदिरा भवन में कांग्रेस अलाकमान के साथ लंबी चर्चा के बाद आखिरकार सिद्धारमैया (Siddaramaiah) ने आज गुरुवार, (28 मई 2026) को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे का ऐलान कर दिया। 20 मई 2023 से लेकर 28 मई 2026 ( 3 साल, 8 दिन) तक वह राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बने रहें। हालांकि, उनका यह कार्यकाल काफी चुनौतीपूर्ण रहा। विपक्ष तो दूर कांग्रेस पार्टी के नेताओं में आंतरिक कलह और मख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर जारी खिंचतान कई बार खुलकर सामने आई।

कर्नाटक में होने जा रहा सत्ता परिवर्तन कांग्रेस और उनके नेताओं के लिए कितना अनुकुल होगा, ये तो भविष्य में ही नजर आएगा। लेकिन, सिद्धारमैया के इस्तीफे के साथ ही उनके कार्यकाल को भी कई सवाल उठने लगे हैं। 2023 विधानसभा चुनावों में मिली जीती के साथ कांग्रेस सत्ता में वापसी की। हालांकि, मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार (DK Shivkumar) के बीच 'ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला' तय हुआ। जो पार्टी में खिंचतान की वजह बन गई।

कुर्सी की रस्साकशी में जनता बेहाल

सिद्धारमैया के इस्तीफे और डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की सियासी लड़ाई के बीच राज्य के विकास कार्यों पर काफी गहरा असर पड़ा है। कर्नाटक के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि एक और ब्रांड बेंगलुरु और नई औद्योगिक नीतियों के तहत विकास के लिए भारी मात्रा में बजट का आवंटन हुआ। वहीं, दूसरी ओर लंबे समय से अटकी राजनीतिक खींचतान के कारण जमीनी स्तर पर प्रशासनिक कार्य, बजट की कमी और कई परियोजनाओं में देरी जैसी कई चुनौतियां देखी गईं। राज्य के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे डीके शिवकुमार के सामने ये बड़ी चुनौतियां होंगी, जो कि कांग्रेस के पॉवर संतुलन की वजह से उभरी हैं।

1. आर्थिक चुनौतियां और वित्तीय दबाव

राज्य का बजट 4 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है, जिसमें गृहलक्ष्मी, शक्ति और गृह ज्योति जैसी पांच प्रमुख गारंटी योजनाओं पर 51,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए। राज्य की विपक्षी पार्टियों ने सीएम की कुर्सी की खिंचतान और इन्हीं योजनाओं को राज्य के बढ़ते कर्ज और राजकोषिय घाटे का मुख्य कारण बताया है।

कर्नाटक के सामने आर्थिक चुनौतियां और वित्तीय दबाव।
कर्नाटक के सामने आर्थिक चुनौतियां और वित्तीय दबाव।

2. बुनियादी सुविधाएं और विकास

राजधानी बेंगुलुरु के लिए वार्षिक अनुदान राशि 3,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 7,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। ब्रांड बेंगलुरु के तहत पेरीफेरल रिंग रोड और 40,000 करोड़ रुपये की सुरंग रोड जैसे प्रोजेक्ट अभी भी पूरा नहीं हो सका।

3. टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्री पर असर

बेंगलुरु को ग्लोबल हब बनाए रखने के लिए सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप टेक सेक्टर में बड़े लेवल पर इन्वेस्टमेंट की घोषणाएं की गई। हालांकि, जमीन स्तर पर इसमें कुछ भी विकसित नजर नहीं आ रहा है। मैसूर, हुब्बल्ली-धारवाड़ और कलबुर्गी जैसे टियर-2 शहरों में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार करने पर जोर दिया गया।

4. सियासी लड़ाई का प्रभाव

कर्नाटक में लंबे समय से चल रही सियासी लड़ाई और नेतृत्व परिवर्तन की अनिश्चितता के कारण प्रशासनिक गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। इससे नम्मा मेट्रो के विस्तार, ट्रैफिक मैनेजमेंट और अन्य प्रमुख विकास कार्यों की रफ्तार धिमी हुई है।

कांग्रेस के भीतर जारी सियासी लड़ाई का विकास कार्यो पर असर।
कांग्रेस के भीतर जारी सियासी लड़ाई का विकास कार्यो पर असर।

नए मुख्यमंत्री के सामने कई चुनौतियां

सिद्धारमैया के इस्तीफे के साथ कर्नाटक में लंबे समय से जारी सियासी उठापटक भले ही नया मोड़ ले लिया हो, लेकिन यह खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। मुख्यमंत्री पद से सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद से समर्थकों में काफी नाराजगी है। यहां तक कई कुछ समर्थकों ने राहुल गांधी का फोटो जलाते हुए भी नजर आए। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या डीके शिवकुमार कांग्रेस को एकजुट रख पाएंगे। एक तरफ सिद्धारमैया गुट है, तो दूसरी ओर डीके शिवकुमार के समर्थक जो लंबे समय से इनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए लॉबिंग कर रहे थे।

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