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अमेरिकी दबाव के आगे कभी नहीं झुका भारत, पहले भी इन मुद्दों पर दिया है करारा जवाब
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
1971 के युद्ध में सातवें बेड़े का खौफ हो या कोल्ड वार के समय का दबाव। चाहे परमाणु परीक्षण की नाराजगी हो या फिर आज के हालात। भारत ने देशहित को ऊपर रखते हुए अमेरिकी दबावों का कई बार डटकर सामना किया है।

अमेरिका को इन मुद्दों पर भारत ने दिया है करारा जवाब, फोटो: सोशल मीडिया
India vs America: भारत और अमेरिका के बीच कई बार ऐसे दौर आए हैं जब दोनों देश एक दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दिए। अमेरिका ने कई बार भारत के ऊपर अपने फैसले थोपने की कोशिश भी की। लेकिन भारत बिना झुके इस वैश्विक महाशक्ति का सामना करता रहा है।
आजादी के बाद से कई बार ऐसी परिस्थितियां बनीं जब भारत पर अमेरिका ने दबाव बनाने के भरसक प्रयास किए। कई बार सीधे तौर पर तो कई बार दूसरे देशों का सहारा लेते हुए अमेरिका ने भारत को निशाना बनाने की कोशिश की। लेकिन हर बार भारत अपनी कूटनीति के दम पर अमेरिका की चाल को उलटकर एक स्वाभिमान देश की मिसाल बनकर उबरा है।
शीत युद्ध के दौर में गुटनिरपेक्षता की नीति
1947 में आजादी के तुरंत बाद भारत ने जब गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) को अपनाया तो अमेरिका को यह रुख नागवार गुजर गया। अमेरिका चाहता था कि भारत पश्चिमी खेमे में शामिल हो जाए। उस समय के अमेरिकी राजदूत हेनरी ग्रेडी ने नेहरू से कहा कि लोकतांत्रिक खेमे में आना भारत के हित में है। लेकिन भारत ने यह सुझाव अस्वीकार कर दिया। नेहरू ने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी गुट में शामिल नहीं होगा और वह विश्व मामलों में स्वतंत्र सोच और निर्णय बनाए रखेगा। उस समय कश्मीर मुद्दे पर भी अमेरिका की मध्यस्थता के सुझाव को भारत ने नकार दिया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका संस्थापक के रूप में रही जिसने उसे वैश्विक मंच पर खास पहचान दी।
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1965 के युद्ध में गेहूं आपूर्ति पर अमेरिकी धमकी
भारत जब 1965 में पाकिस्तान से युद्ध लड़ रहा था तब देश भारी खाद्यान्न संकट से भी जूझ रहा था। देश में सूखा पड़ा हुआ था। हरित क्रांति अभी पूरी तरह फली-फूली नहीं थी और गेहूं की आपूर्ति अमेरिका पर निर्भर थी। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने भारत को धमकी दी कि अगर युद्ध नहीं रोका गया तो गेहूं भेजना बंद कर दिया जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा “बंद कर दीजिए गेहूं भेजना।” भारत ने इस दबाव को नकारते हुए घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दिया और हरित क्रांति की नींव रखी।

1971 भारत-पाक युद्ध में अमेरिका का सातवां बेड़ा
1971 में जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो अमेरिका ने खुले रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया। युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपना सातवां नौसेना बेड़ा (USS Enterprise) बंगाल की खाड़ी में भेजा जो भारत को डराने की कोशिश मानी जा रही थी। भारत ने इस चुनौती का सामना करते हुए युद्ध जारी रखा। भारत के समर्थन में सोवियत संघ ने अपना नौसेना बेड़ा भेज दिया जिसके बाद अमेरिका पीछे हट गया। भारत की जीत के साथ ही बांग्लादेश का गठन हुआ और अमेरिकी हस्तक्षेप पूरी तरह विफल रहा।

पोखरण परमाणु परीक्षणों पर अमेरिकी नाराजगी
भारत ने 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षण किए। अमेरिका ने इन परीक्षणों के बाद भारत पर तकनीकी और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। खास तौर से 1998 के पोखरण-II परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत को अलग-थलग करने की कोशिश की और IMF-वर्ल्ड बैंक से लोन भी रुकवाया। बावजूद इसके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी रक्षा नीति खुद तय करेगा। भारत ने इन प्रतिबंधों को झेलते हुए आत्मनिर्भरता बढ़ाई और परमाणु शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की। साल 2005 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद यह गतिरोध समाप्त हुआ और भारत को परमाणु राष्ट्र के रूप में वैश्विक मान्यता मिल गई।

रूस से S400 मिसाइल की खरीद पर अमेरिका की धमकी
साल 2018 में भारत ने रूस से S400 मिसाइल रक्षा प्रणाली का सौदा किया। यह अमेरिका के लिए असहज करने वाला निर्णय था क्योंकि अमेरिका ने CAATSA कानून के तहत रूस से हथियार खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाने की नीति बनाई थी। अमेरिका ने भारत को कई बार चेताया भी कि अगर उसने यह सौदा किया तो प्रतिबंध लगेंगे। इसपर भारत ने साफ शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में वह किसी की अनुमति नहीं लेगा। भारत ने मिसाइल की डिलीवरी ली और अमेरिका को कोई प्रतिबंध भी नहीं लगाने दिया। यह भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता की एक और जीत थी।
रूस से तेल खरीद पर दबाव
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाए और भारत पर भी रूसी तेल खरीद कम करने का दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन भारत ने इस दबाव को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दो टूक कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतें खुद तय करेगा। भारत ने रूसी तेल खरीद को 1% से बढ़ाकर 20% से अधिक कर दिया। सस्ता तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद रहा और देश ने कच्चे तेल पर बेहतर सौदेबाजी की स्थिति हासिल की।
कृषि आयात पर हुए टकराव
हाल ही में अमेरिका ने भारत पर अपने कृषि उत्पादों के आयात के लिए भी दबाव बनाया। अमेरिका चाहता था कि भारत GM खाद्यान्न, मांस और अन्य प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को आयात में छूट दे। लेकिन भारत ने अपने किसानों और कृषि हितों की रक्षा करते हुए इसे खारिज कर दिया। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि भारत वही व्यापार समझौते करेगा जो देश के हित में हों। अमेरिका की यह कोशिश भी नाकाम रही।
यह भी पढ़ें: अमेरिकी वित्त मंत्री बेसेंट ने खोला राज, बताया भारत से क्यों नाराज है ट्रंप…
इन सभी घटनाओं से स्पष्ट है कि भारत ने वैश्विक दबावों के बावजूद कभी अपने स्वाभिमान या रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया। अमेरिका जैसे महाशक्ति ने हर दशक में भारत को अपने हिसाब से झुकाने की कोशिश की, लेकिन भारत ने दृढ़ नीतियों के जरिए हर बार अपने हितों की रक्षा की।
Indian american relations 1965 war pokhran test india never bowed down to american pressure
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