

Ex MLA Pension Cost to Government: बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश इन दिनों बड़े संवैधानिक विवाद में फंस गए हैं। उनके मंत्री पद को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। वजह यह है कि दीपक प्रकाश बिहार विधानसभा या विधान परिषद में से किसी के सदस्य नहीं हैं। इसके बावजूद वे मंत्री पद पर बने हुए हैं।
मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। राकेश कुमार सिंह नाम के एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री नियुक्ति को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के प्रावधानों के मुताबिक बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई व्यक्ति सीमित समय तक ही मंत्री रह सकता है।
एमएलसी चुनाव में नामांकन नहीं करने के बाद दीपक प्रकाश के लिए मंत्री पद पर बने रहना मुश्किल हो सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट पहले के फैसले और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर विचार करता है, तो उन पर पद छोड़ने का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अंतिम फैसला अदालत और सरकार के अगले कदम पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना तय है कि दीपक प्रकाश का मामला अब केवल राजनीति का नहीं, बल्कि संविधान और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। ऐसे में अगर दीपक इस्तीफा देते हैं, तो वह पूर्व मंत्रियो को मिलने वाले पेंशन का हकदार हो जाएंगे।
अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या कोई व्यक्ति सिर्फ एक दिन या कुछ महीनों के लिए मंत्री या विधायक बने, तो क्या वह जीवनभर पेंशन पाने का हकदार हो जाता है? इसका जवाब है- हां, भारत के अधिकांश राज्यों में ऐसा ही नियम है। आइए इस एक्स्प्लेनर में समझते हैं कि नेताओं की पेंशन का यह पूरा गणित क्या है। अलग-अलग राज्यों में इसके क्या नियम हैं और हर साल देश की जनता की गाढ़ी कमाई का कितना हिस्सा इन 'पूर्व माननीयों' की सुख-सुविधाओं पर खर्च होता है।
भारत के संसदीय और राज्य विधानसभा नियमों के अनुसार, किसी भी नागरिक को विधायक या सांसद के रूप में शपथ लेते ही पेंशन का अधिकार मिल जाता है। अधिकांश राज्यों के नियमों के मुताबिक, इसके लिए 5 साल का कार्यकाल पूरा करना जरूरी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति विधानसभा चुनाव जीतने के बाद सिर्फ 1 दिन के लिए भी सदन का सदस्य रहता है या सरकार गिरने के कारण कुछ दिनों में ही मंत्री पद से हट जाता है, तो भी वह लाइफटाइम के लिए पेंशन का हकदार बन जाता है।
संसद के नियमों (Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Act) के तहत, यदि कोई व्यक्ति एक दिन के लिए भी लोकसभा या राज्यसभा का सांसद बनता है, तो वह मिनिमम 25,000 रुपये प्रति महीने की पेंशन का हकदार हो जाता है। 5 साल से ज्यादा सेवा देने पर हर अतिरिक्त साल के लिए 2,000 रुपये प्रति महीने अलग से जुड़ते हैं।
राज्यों के विधायकों की सैलरी और पेंशन तय करने का पूरा अधिकार खुद राज्य विधानसभाओं के पास होता है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग राज्यों में पूर्व विधायकों की पेंशन में भारी अंतर देखने को मिलता है।
| राज्य / विधानसभा | न्यूनतम शुरुआती पेंशन (प्रति माह) | अतिरिक्त नियम / भत्ते |
| तेलंगाना | ₹50,000 | हर अतिरिक्त साल के लिए ₹2,000 एक्स्ट्रा (अधिकतम ₹70,000) |
| हरियाणा | ₹50,000+ | कार्यकाल के अनुसार बढ़कर ₹2.38 लाख प्रति माह तक (RTI डेटा के अनुसार) |
| तमिलनाडु | ₹35,000 | चिकित्सा भत्ता अलग से (हाल ही में संशोधित) |
| उत्तर प्रदेश | ₹25,000 | हर अतिरिक्त वर्ष के लिए ₹2,000 की बढ़ोतरी और मुफ्त रेलवे पास |
कई राज्यों में यह नियम भी रहा है कि एक नेता जितनी बार चुनाव जीतेगा, उसकी पेंशन उतनी ही गुना बढ़ती जाएगी। उदाहरण के लिए, अगर कोई नेता 5 बार विधायक रहा, तो उसकी पेंशन लाखों रुपये में पहुंच जाती है। एक आरटीआई (RTI) रिपोर्ट में हुए खुलासे के मुताबिक, हरियाणा के कुछ वरिष्ठ पूर्व विधायकों को हर महीने 2,22,500 रुपये से लेकर 2,38,000 रुपये तक की पेंशन दी जा रही है।
पूर्व जनप्रतिनिधियों की पेंशन और उनके मेडिकल अलाउंस पर हर साल राज्य सरकारों के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। एक आरटीआई के जवाब में सामने आया कि हरियाणा सरकार हर साल अपने लगभग 275 पूर्व विधायकों और उनके परिवारों को पेंशन देने में करीब 28 करोड़ रुपये खर्च करती है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (MLCs) की संख्या हजारों में है। यहां यह सालाना खर्च 100 करोड़ रुपये से 150 करोड़ रुपये के पार चला जाता है।
पूर्व विधायकों को केवल कैश पेंशन नहीं मिलती। इसके साथ ही मुफ्त या बेहद रियायती दरों पर सरकारी चिकित्सा सुविधाएं। फर्स्ट क्लास एयर कंडीशनर रेलवे पास या मुफ्त हवाई यात्रा के कूपन। कुछ राज्यों में मुफ्त टेलीफोन और बिजली भत्ते भी पूर्व विधायकों को सरकार की ओर से दी जाती है।
इस शाही व्यवस्था पर बढ़ते जन-आक्रोश के बीच पंजाब सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया था। पंजाब में पहले नियम था कि कोई जितनी बार विधायक बनेगा, उतनी पेंशन (जैसे- 5 बार के विधायक को करीब 3.25 लाख करोड़) मिलेगी। हालांकि, बाद में पंजाब सरकार ने कानून बदलकर 'एक विधायक, एक पेंशन' का नियम लागू किया। अब कोई नेता चाहे 1 बार जीते या 10 बार, उसे केवल एक ही कार्यकाल की बेस पेंशन मिलेगी। इस एक फैसले से पंजाब सरकार को हर साल करोड़ों रुपये की बचत हो रही है। इस मॉडल को देश के अन्य राज्यों में भी लागू करने की मांग लगातार उठ रही है।