
दीन दयाल उपाध्याय
नवभारत डेस्क: आज हम उस नेता के बारे में चर्चा करेंगे जो ता उम्र पर्दे के पीछे रहा। लेकिन अपनी प्रतिभा और मार्गदर्शन से एक नई- नवेली पार्टी को इतना ऊपर उठाया कि आज दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। ऐसे सख्श के व्यक्तित्व के बारे में जानने से पहले हम थोड़ा फ्लैश बैक में जाते हैं।
1950 के फरवरी महीने में पूर्वी पाकिस्तान में में हिंदू विरोधी दंगो में 10000 लोग मारे गए। लगभग 8 लाख 60 हजार हिंदू भारत आए। जबकि 6 लाख 50 हजार मुसलमानों ने पश्चिम बंगाल से दूसरी तरफ का रूख किया। तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने पाकिस्तान को चेतावनी दी। कि अगर पाकिस्तान, हिंदुओं को बाहर निकालने में अमादा है तो हमें पर्याप्त जमीन भी देनी होगी ताकि हम उन्हें बसा सकें।
दूसरी तरफ इसपर प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि भूमि के लिए कोई दावा पूरी तरह से अवास्तविक है। नेहरू की निष्पक्ष रवैये की हिमायत से युद्ध को टाल दिया गया।
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मुखर्जी का मंत्रिमंडल से त्याग पत्र
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ भारत ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, जिसमें दोनों देशों के अल्पसंख्यकों की रक्षा करने और शरणार्थियों के आवागमन को काबू में करने के लिए व्यवस्था सुनिश्चि की गई थी। इस समझौते को तत्कालीन उद्योगमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने विश्वासघात के रूप में देखा। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा द्वारा गैर-हिंदुओं को प्रवेश देने में आनाकानी करने पर मुखर्जी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1950 में उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।
सरदारवल्लभ भाई पटेल का निधन
मुखर्जी के इस फैसले पर हिंदू महासभा और आरएसएस ने खुशी जाहिर की और उन्हें अपना समर्थन दिया। इस घटनाक्रम के 8 महीने बाद 75 वर्ष के सरदारवल्लभ भाई पटेल का दिल का दौरा पड़ा और मुंबई में उनका निधन हो गया। मुखर्जी का सरकार से जाने और फिर पटेल के निधन के बाद राजनीति में प्रभाव कम हो गया था।
दिल्ली से नागपुर आए मुखर्जी
इसके बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी दिल्ली से 1000 किलोमीटर दूर नागपुर आ गए। यहां वे वीडी सावरकर के यहां रहते थे। स्वतंत्र भारत का पहला चुनाव साल भर दूर था और मुखर्जी एक नए राजनीतिक दल का गठन करना चाहते थे। उसे आकार देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एमएस गोलवलकर से मदद मांगी। हालांकि उन्होंने मुखर्जी को चेतावनी देते हुए मना कर दिया। उन्होंने कहा कि संघ किसी राजनीतिक दल की पूंछ नहीं बनेगा।
मुखर्जी ने चार महीने बाद दल बनाने की योजना की बैठक बुलाई। हालांकि आरएसएस पर आए मुसीबतों को देखते हुए गोलवलकर को ये आभास हो गया था कि संगठन को राजनीति पार्टी का साथ जरूरी है। गुरू जी यानी गोलवलकर, मुखर्जी की मदद के लिए मान गए।
पांच स्वर्ण मुद्राएं
गोलवलकर ने मुखर्जी से वादा किया कि वो दल की गठन के लिए उनका समर्थन करेंगे। नई राजनीतिक पार्टी के गठन के लिए गाेलवलकर ने मुखर्जी को पांच स्वर्ण मुद्राएं देने का वादा किया। उन्होंने जल्द ही कुछ आरएसएस नेताओं को नई पार्टी में भेज दिया। इनमें दीन दयाल उपाध्याय, सुंदर सिंह भंडारी, नानाजी देशमुख, बापू साहेब सोहनी और बलराज मोधक शामिल थे। यानी कि मुखर्जी को इनके रूप में ये पांच स्वर्ण मुद्राएं मिलीं। अब यहां से शुरू होती है दीन दयाल उपाध्याय की कहानी। आज उनकी जयंती है।
21 अक्टूबर 1951 में जनसंघ की स्थापना
21 अक्टूबर 1951 को नई राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ की स्थापना जलती लौ वाला दीया के साथ हुआ। दल के घोषणापत्र में शामिल हुआ एक संस्कृति और एक धर्म राज्य, धर्मशासित राज्य नहीं, बल्कि विधि के शासन का आश्वासन देते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पार्टी का चेहरा बनाया गया। लेकिन परदे के पीछे आरएसएस का एक व्यक्ति सर्वशक्तिमान महासचिव बन गया। लॉजिस्टिक के प्रति झुकाव रखने वाला महीन मूंछों और मोटे चश्मे वाला एक दुबला-पतला व्यक्ति। इनका नाम था। पंडित दीन दयाल उपाध्याय।
दीन दयाल उपाध्याय का जन्म भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा, उत्तर प्रदेश 1916 में हुआ था। ये एक निर्धन, धार्मिक ब्राम्हण परिवार में जन्में थे। बहुत कम उम्र में दीन दयाल उपाध्याय अनाथ हो गए थे। ऐसे में इन्हें आरएसएस संगठन के रूप में स्थाई परिवार मिला।
राजनीति में दीन दयाल उपाध्याय ने क्या भूमिका निभाई
मुखर्जी के अपेक्षा अंग्रेजी के मामले में दीन दयाल सहज नहीं थे। प्रसिद्धि को लेकर भी वे असहज थे। वे खूब लिखते थे। लेकिन कोई मौलिक लेखक और कवि नहीं थे।दीन दयाल जो थे वो शब्द और ज्ञान नहीं बल्कि प्रतिभा को पहचानने और उनका मार्गदर्शन करने के अपने विवेक की वजह से थे। उनकी इस विशेषता ने उन्हें जनसंघ के सिंहासन के पीछे की आदर्श शक्ति बना दिया।
दीन दयाल की खोज हैं अटल
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदी तंग थी। हिंदी भाषी क्षेत्रों में चुनाव प्रचार में दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। इसी बीच दीन दयाल उपाध्याय की नजर एक 27 साल के लड़के पर नजर गई जो आरएसएस पत्रिका का संपादन कर रहा था। ये नव युवक अटल बिहारी बाजपेयी थे। दयाल ने उन्हें पांचजन्य में जगह दी। दयाल ने वाजपेयी को मुखर्जी का अनुवादक सहयोगी के रूप में नियुक्त कर दिया। 1951-1952 चुनाव में मुखर्जी के रेल गाड़ी पर वाजपेयी सवार होकर अनुवादक के रूप में चल पड़े।
मुखर्जी का उत्तराधिकारी
दरअसल, दीन दयाल ने वाजपेयी में मुखर्जी के सहयोगी के रूप में नहीं बल्कि उनमें पार्टी का भविष्य देख रहे थे। 23 जून 1953 को मुखर्जी का दिल का दौरा पड़ने पर निधन हो गया। इसके बाद दयाल ने वाजपेयी को मुखर्जी का उत्तराधिकारी चुना। बाजपेयी को उन्होंने 1954 में लखनऊ सीट से विजयलक्ष्मी पंडित के खिलाफ टिकट दिया। हालांकि वाजपेयी चुनाव हार गए। दयाल ने न तो अपना विश्वास वाजपेयी पर खोया और न ही वाजपेयी का आत्मविश्वास कमजोर होने दिया। 1957 में वाजपेयी को तीन सीटों से टिकट दिया गया। बलरामपुर, लखनऊ और मथुरा। वाजपेयी बलरामपुर सीट से जीत गए और सदन का नेता वाजपेयी को बनाया गया।
मुखर्जी की मौत के बाद फ्रंट पर आए दीन दयाल
हालांकि वाजपेयी को आगे बढ़ाना दीन दयाल के लिए इतना भी आसान नहीं था। पार्टी में ही वाजपेयी के कई आलोचक थे और उनके विरोध में थे। पार्टी को एकजुट रखना और पार्टी को भविष्य देने में दयाल को बहुत पापड़ बेलने पड़े। दयाल की सबसे बड़ी जो खासियत थी कि मुखर्जी के निधन के बाद पार्टी में पनपे मनभेद और मतभेद को उन्होंने साध कर रखा। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने पार्टी को एकजुट रखा। संगठित रखा।
कांग्रेस का तोड़ निकाला दयाल ने आडवाणी के रूप में
पार्टी में हिंदी के प्रखर वक्ता और वाक पटुता के रूप में वाजपेयी तो अग्रणी थे ही, लेकिन पार्टी में अंग्रेजी सहज तेज तर्रार कोई नहीं था जो नेहरू की तरह अंग्रेजी संभ्राग में पकड़ बना पाए। इसका भी तोड़ दयाल ने निकाला। उन्होंने कराची के बाशिंदे लाल कृष्ण आडवाणी की संघ से पार्टी में सक्रियता बढ़ाई। अंग्रेजी भाषा में सहज आडवाणी को दयाल ने अंग्रेजी संभ्रांग में वाजपेयी के घुलने मिलने में मदद करने में लगा दिया।
वाजपेयी जब लड़खड़ाए दीन दयाल ने संभाला
1962 के चुनाव में जनसंघ पार्टी ने एक बार फिर से वाजपेयी को टिकट दिया। इस बार उनके खिलाफ कांग्रेस उम्मीदवार स्वतंत्रता सेनानी सुभद्रा जोशी थीं, जिनके लिए खुद नेहरू ने क्षेत्र में प्रचार-प्रसार किया। परिणाम स्वरूप वाजपेयी हार गए। दयाल ने कहा सदन में वाजपेयी का रहना बेहद जरूरी है। इसलिए बाजपेयी को राज्यसभा की टिकट दी और उन्हें उच्च सदन का सदस्य बना दिया गया।
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मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास मिला शव
पंडित दीन दयाल उपाध्याय की उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में 10 और 11 फरवरी 1968 की मध्य रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनका शव पाया गया। हालांकि उनकी मौत पर कई तरह की दावे किए गए। कुछ लोगों ने उनकी मौत को हत्या भी बताया। दीन दयाल ने 10 फरवरी की शाम को लखनऊ से पटना जाने के लिए सियालदाह एक्सप्रेस पकड़ी थी। सियालदाह एक्सप्रेस जब मुगलसराय रेलवे स्टेशन पहुंची तो उसमें दीन दयाल उपाध्याय नहीं थे। सूचना हुई तो खोजबीन शुरू की गई। ट्रेन आने के करीब 10 मिनट बाद मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास शव मिला। दीन दयाल के हाथ में 5 रुपये का नोट और उनकी जेब में 24 रूपये थे।
पार्टी के भविष्य का निर्माण
ये था कि दीन दयाल उपाध्याय ने अब तक पार्टी को एक मजबूत स्थिति में खड़ी कर चुके थे और उसे आगे ले जाने वाले भविष्य का निर्माण भी कर चुके थे।






