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Central Government Plans to Change Death Penalty Rules: भारत में मौत की सज़ा देने के तरीके को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने की संभावना है। अभी तक, जघन्य अपराधों के दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाया जाता रहा है, जिसके लिए जल्लाद नियुक्त होते हैं। अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह फांसी की जगह कोई दूसरा, कम पीड़ादायक तरीका ढूंढ रही है। अगर यह बदलाव होता है, तो यह सदियों पुरानी परंपरा को बदलकर एक मानवीय विकल्प स्थापित करेगा।
केंद्र सरकार फांसी की सज़ा देने के मौजूदा तरीके को बदलने पर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह जानकारी दी है कि वह फांसी की जगह कोई ऐसा विकल्प लाने की योजना बना रही है जो कम दर्दनाक और अधिक मानवीय हो। यह चर्चा इसलिए शुरू हुई है क्योंकि फांसी को एक क्रूर और पुराना तरीका माना जाता है, जो दोषी को लंबा शारीरिक कष्ट दे सकता है।
फिलहाल, इस मुद्दे पर विचार-विमर्श जारी है और सरकार किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंची है। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार को एक ठोस स्थिति पेश करने के लिए कुछ और समय चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं इस मुद्दे से परिचित हूँ। कुछ बैठकों में चर्चा हुई है, लेकिन अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है।”
यह मामला वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर एक याचिका के कारण अदालत में आया है। मल्होत्रा ने फांसी देने के तरीके को असंवैधानिक बताया है। उनका तर्क है कि यह तरीका भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले ‘गरिमा के साथ जीवन के अधिकार’ का उल्लंघन करता है। उनका कहना है कि फांसी में दोषी को बहुत ज़्यादा पीड़ा होती है, जबकि दुनिया के 40 से अधिक देशों ने अब फांसी को छोड़कर लेथल इंजेक्शन जैसे कम दर्द वाले तरीकों को अपना लिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले यह माना था कि फांसी का तरीका औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है और दुनिया में कई जगह इसमें बदलाव हो चुका है। कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि क्या दोषियों को फांसी और अन्य विकल्पों में से चुनाव करने का अधिकार दिया जा सकता है।
हालांकि सरकार ने अपने पुराने हलफनामे में यह कहा था कि फांसी ही सबसे सुरक्षित और तुरंत मौत देने वाला तरीका है और लेथल इंजेक्शन में असफलता की संभावना अधिक रहती है, फिर भी अब सरकार का रुख बदल रहा है।
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केंद्र ने अदालत को भरोसा दिया है कि वह वैकल्पिक तरीकों पर अध्ययन कर रही समिति की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। यह बहस केवल एक कानूनी मसला नहीं है, बल्कि यह आधुनिक मानवता और संवेदना का भी सवाल है। अगर सरकार और न्यायपालिका इस दिशा में आगे बढ़ती हैं, तो भारत में मौत की सज़ा देने का तरीका हमेशा के लिए बदल सकता है, जिससे फांसी देने वाले जल्लादों की ज़रूरत समाप्त हो जाएगी। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी।






