Explainer: कैसे बचती है दल-बदल में सदस्यता, क्या है इसके लिए कानून? जिससे तय होगा राघव चड्ढा और AAP का भविष्य

Anti-Defection Law India: AAP संकट के बीच चर्चा में आए दल-बदल कानून को समझें। क्या 7 सांसदों का साथ होना सदस्यता बचाने के लिए काफी है? जानें स्पीकर की शक्ति और 10वीं अनुसूची के कड़े प्रावधान।
Anti-Defection Law Explained
सांकेतिक तस्वीर (Image- AI)
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Anti-Defection Law Explained: आम आदमी पार्टी (AAP) में हालिया राजनीतिक उठापटक के बाद दल-बदल विरोधी कानून एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। यह कानून सरकारों की स्थिरता और सदन में संख्या संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद अहम माना जाता है।

इस कानून को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी सांसद या विधायक चुनाव के बाद निजी या राजनीतिक फायदे के लिए पार्टी न बदले।

कानून का मूल सिद्धांत

यदि कोई जनप्रतिनिधि अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचार्य के अनुसार, 2003 में किए गए संशोधन के बाद यह प्रावधान जोड़ा गया कि यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक एक साथ किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं माना जाएगा।

क्या है स्पीकर की भूमिका?

ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय सदन के स्पीकर या सभापति लेते हैं। अगर किसी सदस्य के खिलाफ शिकायत होती है, तो स्पीकर यह तय करते हैं कि दल-बदल कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। हालांकि, उनका फैसला अंतिम नहीं होता और इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है, जिससे कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है।

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चुनाव आयोग (Image- Social Media)

चुनाव आयोग की भूमिका कब आती है?

जब किसी पार्टी में टूट या “असली पार्टी” पर दावा होता है, तब मामला भारत निर्वाचन आयोग तक पहुंचता है। आयोग यह तय करता है कि संगठन, चुने हुए प्रतिनिधियों और पार्टी संविधान के आधार पर किस गुट का दावा मजबूत है। चुनाव चिह्न पर विवाद भी इसी स्तर पर सुलझाया जाता है।

इस्तीफा और अयोग्यता में अंतर

यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से इस्तीफा देता है और वह स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह सामान्य प्रक्रिया होती है। लेकिन यदि उसे दल-बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है, तो वह तत्काल मंत्री नहीं बन सकता और दोबारा चुनाव लड़ना जरूरी होता है। अयोग्य सदस्य फ्लोर टेस्ट जैसी प्रक्रियाओं में भी हिस्सा नहीं ले सकता।

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सुप्रीम कोर्ट, (सोर्स- सोशल मीडिया)

सुप्रीम कोर्ट ने भी उठाए थे सवाल

2020 में सुप्रीम कोर्ट  ने संसद से इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करने को कहा था। कोर्ट ने सुझाव दिया था कि स्पीकर की जगह किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष ट्रिब्यूनल, जैसे रिटायर्ड जजों की समिति, को अयोग्यता मामलों का फैसला करना अधिक पारदर्शी विकल्प हो सकता है।

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