फाइल फोटो- जाट आरक्षण आंदोलन
Jat Resrvation Movement: हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन की सुगबुगाहट एक बार फिर सुनाई दे रही है। 2016 में जाट आरक्षण के हिंसक आंदोलन की यादें अभी भी जहन में ताजा हैं। इसलिए आंदोलन से राज्य की शांति भंग होने की आशंका स्वाभाविक है। हालांकि शांतिपूर्ण आंदोलन हो इसके लिए अभी से कोशिशें जारी हैं। हरियाणा में अक्टूबर माह में जाट आरक्षण के लिए आंदोलन शुरू किया जाएगा।
आंदोलन शुरू करने से पहले राज्य में जिला और विधानसभा स्तर पर भाईचारा सम्मेलन आयोजित कर रणनीति बनाई जा रही है। जाट आरक्षण समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रताप सिंह दहिया की अगुवाई में शनिवार को चरखी दादरी में भाईचारा सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन में समाज के लोगों ने एकजुट होकर संघर्ष करने का संकल्प लिया।
दादरी की जाट धर्मशाला में आयोजित भाईचारा सम्मेलन की अध्यक्षता आरक्षण समिति के प्रदेश अध्यक्ष गंगाराम श्योराण ने की। जाट नेताओं ने कहा कि सरकार द्वारा जाट समाज को सिर्फ आश्वासन दिया जा रहा है। इस बार समाज को एकजुट कर हकों को लेकर जागरूक कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले भी अपने हकों के लिए 52 दिन तक शांतिपूर्वक आंदोलन किया था। उस दौरान कुछ लोगों ने आंदोलन के बीच घुसकर उनके आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास किया था। उन्हें बार-बार सरकार द्वारा अहीर, गुर्जर के समान आरक्षण देने का वादा किया गया है, लेकिन इसे धरातल पर लागू नहीं किए जाने के कारण जाट समाज को इसका लाभ नहीं मिल पाया है।
जाट नेताओं ने कहा कि प्रदेश के सभी 90 विधानसभा स्तर पर भाईचारा सम्मेलन कर रहे हैं। 5 अक्टूबर को रोहतक के जसिया में छोटूराम धाम पर प्रदेश स्तरीय सम्मेलन आयोजित कर जाट आरक्षण को लेकर रूपरेखा तैयार की जाएगी। इस बार वे शांतिपूर्वक ढंग से दोबारा आंदोलन शुरू करेंगे। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में राज्य स्तर पर जाट समुदाय के लोगों को ओबीसी का दर्जा प्राप्त है। हालांकि केंद्र सरकार ने ओबीसी का दर्जा नहीं दिया है। वहीं हरियाणा में जाट जनरल कटैगरी में आते हैं। इसलिए अब जाट समुदाय ओबीसी में शामिल किए जाने की मांग कर रहा है।
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बता दें कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में जाट समुदाय के लोगों ने ओबीसी आरक्षण की मांग को लेकर 2016 में आंदोलन किया था। शांतिपूर्ण आंदोलन कुछ दिनों बाद हिंसक हो गया था। आंदोलन ने राज्य में गंभीर हिंसा भड़काई, जिससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना को बुलाना पड़ा। इस आंदोलन के दौरान काफी जान-मान को नुकसान पहुंचा था।