

मुंबई: बॉलीवुड के चर्चित फिल्म निर्माता-निर्देशक साजिद खान ने हाल ही में एक विवादास्पद लेकिन विचारणीय बयान दिया कि अब बॉलीवुड में हीरो नहीं बचे, अब कोई भी फिल्म कर सकता है। उनका यह कथन न केवल वर्तमान फिल्मी संस्कृति की आलोचना है, बल्कि पुराने दौर के सिनेमा और आज के यथार्थ के बीच का अंतर भी उजागर करता है।
साजिद खान का मानना है कि अब बॉलीवुड में जो कलाकार मुख्य भूमिका निभाते हैं, वे सिर्फ लीड एक्टर्स हैं, असली हीरो नहीं। उनके अनुसार, पुराने दौर में अभिनेता महज एक किरदार नहीं होते थे, वे आदर्श, प्रेरणा और जनभावनाओं के प्रतीक होते थे। धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और मिथुन चक्रवर्ती जैसे कलाकारों में आंखों की गहराई, संवाद की ताकत और नैतिक दृढ़ता हुआ करती थी, जो दर्शकों के दिलों में सीधा असर करती थी।
वे आगे कहते हैं कि अब फिल्मों में सिक्स-पैक एब्स को हीरो का मापदंड बना दिया गया है। पहले नायक अपनी दमदार आंखों, संवाद अदायगी और मौजूदगी से दर्शकों को आकर्षित करते थे। आज, एक कलाकार को फिट बॉडी के बिना लायक नहीं माना जाता। साजिद के मुताबिक, अब एक्शन आंखों में नहीं, जांघों में आ गया है। उनका यह व्यंग्य फिल्म उद्योग की सतही चमक-दमक पर गहरी चोट है।
साजिद खान ने साउथ इंडियन फिल्मों का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां आज भी हीरो की 'एंट्री' को भव्यता के साथ दिखाया जाता है। वहां के अभिनेता अभी भी नैतिक आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उन्हें समाज के लिए गलत उदाहरण नहीं बनने दिया जाता। वहीं बॉलीवुड में अब अभिनेता 'सुपरहीरो' नहीं, सिर्फ 'लीड' बनकर रह गए हैं।
इस कथन पर अगर गंभीरता से विचार किया जाए, तो यह सवाल उठता है कि क्या वाकई हीरो अब सिर्फ एक स्टाइलिश चेहरे तक सीमित रह गया है? हालांकि यह भी सच है कि बदलते समाज और सिनेमा की विविधता के चलते अब कहानियों में यथार्थ का प्रवेश हो गया है। रणबीर कपूर, आयुष्मान खुराना, विक्की कौशल जैसे अभिनेता समाज के जटिल पहलुओं को परदे पर उकेर रहे हैं, जो पुराने 'हीरो' की छवि से अलग जरूर हैं, लेकिन कमतर नहीं।