बंगाल के बेहाला पश्चिम का वो सियासी तिलस्म जिसे भाजपा दो दशक बाद भी नहीं भेद पाई, इस चुनाव में क्या होगा?

Behala West Seat Profile: बेहाला पश्चिम कभी वामपंथियों का अभेद्य दुर्ग था, लेकिन बीते दो दशकों से यहां टीएमसी की बादशाहत कायम है। अब 2026 में क्या भाजपा यहां पहली जीत दर्ज कर पाएगी? जानें सब।
बंगाल के बेहाला पश्चिम का वो सियासी तिलस्म जिसे भाजपा दो दशक बाद भी नहीं भेद पाई, इस चुनाव में क्या होगा?
फोटो- नवभारत डिजाइन
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West Bengal Assembly Election: कोलकाता की सड़कों पर जब आप डायमंड हार्बर रोड से गुजरते हैं, तो बेहाला चौराहे की गहमागहमी आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास कराती है। यह सिर्फ एक रिहायशी इलाका नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का वह केंद्र है जिसने सत्ता के बड़े-बड़े उलटफेर देखे हैं।

बेहाला पश्चिम विधानसभा सीट की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, जहां कभी लाल झंडे का राज हुआ करता था, लेकिन आज यह तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत किला बन चुका है। जब इस क्षेत्र के चुनावी इतिहास को खंगाला जाता है तो यहां के मतदाताओं की चुप्पी और उनके फैसले कई गहरे राज खोल देते हैं।

लाल किले से टीएमसी की बादशाहत तक का सफर

बेहाला का सियासी सफर 1951 में शुरू हुआ था, जब यह एक सामान्य सीट हुआ करती थी। उस दौर में यहां फॉरवर्ड ब्लॉक और कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा रहा। 1967 में जब इसे पूर्व और पश्चिम में बांटा गया, तब से लेकर 2006 तक यहां वामपंथियों ने 11 में से 9 बार जीत हासिल की। लेकिन साल 2001 में इस गढ़ में पहली बार सेंध लगी। टीएमसी के पार्थ चटर्जी ने अपनी जीत का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज तक नहीं थमा है। 2011 के परिसीमन के बाद जब कोलकाता नगर निगम के वार्ड 118 से 132 तक की सीमाएं तय हुईं, तो टीएमसी की पकड़ और भी मजबूत हो गई। हालांकि 2016 में सीपीएम ने कड़ी टक्कर दी थी और जीत का अंतर काफी कम रह गया था, लेकिन 2021 में टीएमसी ने फिर से 50 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से अपनी ताकत दिखाई।

क्या भाजपा 2026 में बेहाला में रच पाएगी इतिहास?

अगर हम लोकसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें, तो बेहाला पश्चिम ने हमेशा टीएमसी का साथ दिया है। 2009 से लेकर 2024 तक लगातार चार लोकसभा चुनावों में यहां से टीएमसी को बढ़त मिली है। दिलचस्प बात यह है कि जहां विधानसभा चुनावों में मतदाता बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, वहीं लोकसभा में मतदान का प्रतिशत थोड़ा कम रहता है। 2024 के आंकड़े बताते हैं कि यहाँ मतदाताओं की संख्या बढ़कर करीब 3.18 लाख हो गई है।

कागजी तौर पर देखें तो 2026 की राह टीएमसी के लिए आसान दिखती है क्योंकि उन्होंने लगातार नौ बार जीत का स्वाद चखा है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अभी तक एक बार भी जीत का खाता नहीं खोल पाई है, जबकि लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन फिलहाल कमजोर नजर आ रहा है।

इतिहास और आधुनिकता के बीच धड़क रहा है बेहाला का दिल

बेहाला सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि बंगाल की समृद्ध विरासत का प्रतीक भी है। सबर्णा रॉय चौधरी जैसे जमींदार परिवारों की जड़ों से जुड़ा यह इलाका आज जोका-एस्प्लेनेड मेट्रो कॉरिडोर के जरिए आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। यहां के दुर्गा पूजा पंडाल, सखेर बाजार की रौनक और ऐतिहासिक संग्रहालय इसे कोलकाता के अन्य हिस्सों से अलग बनाते हैं। मध्य कोलकाता और हावड़ा स्टेशन से इसकी कनेक्टिविटी इसे एक प्रीमियम शहरी सीट बनाती है। राजनीति की इस बिसात पर बेहाला पश्चिम के लोग विकास और अपनी पहचान के बीच संतुलन बनाकर वोट देते आए हैं। अब देखना यह होगा कि 2026 के महासमर में क्या भाजपा कोई नया करिश्मा कर पाएगी या ममता बनर्जी का यह गढ़ अजेय ही रहेगा।

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