बिना परमिशन वीडियो अपलोड करने पर हाईकोर्ट सख्त, डिलीट किए गए 13 यूआरएल; बढ़ सकती हैं केजरीवाल की मुश्किलें!

High Court On Arvind Kejriwal Case: अरविंद केजरीवाल के कोर्ट वीडियो विवाद में हाई कोर्ट सख्त। 6 जुलाई को अगली सुनवाई। क्या राजनीतिक साजिश के तहत हुआ वीडियो लीक?
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अरविंद केजरीवाल, फोटो- सोशल मीडिया
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Arvind Kejriwal Court Hearing Video Upload Case: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले ही जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत से रिक्यूजल याचिका खारिज हो चुकी है। अब इसके बाद वीडियो वाले विवाद में फंस गए हैं।

दरअसल, केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने और उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने बिना परमिशन के कोर्ट की हियरिंग को सोशल मीडिया पर अपलोड़ कर दिया था, जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि न्यायपालिका राजनीतिक दवाब में काम करती है।

मामले से जस्टिस करिया हुए अलग

इस मामले में अदालत ने अरविंद केजरीवाल, आप नेताओं, दिग्विजय सिंह और पत्रकार रवीश कुमार को नोटिस भी जारी किया है। बता दें कि अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई को होनी है। गौरतलब है कि पहले इस केस को जस्टिस डी.के उपाधघ्याय और जस्टिस करिया की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया था लेकिन बाद में करिया ने इस केस से खुद को अलग कर लिया जिसके बाद इस केस को दूसरी बेंच के सामने भेजा गया।

वीडियो को अपलोड करना नियमों के खिलाफ- याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अदालत की अनुमति के बिना किसी भी कार्यवाही की रिकॉर्डिंग या उसका प्रकाशन करना नियमों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि 13 अप्रैल की सुनवाई को न सिर्फ रिकॉर्ड किया गया बल्कि उसे सोशल मीडिया पर साझा भी किया गया। आम आदमी पार्टी के नेताओं सहित अन्य लोगों द्वारा इसे प्रसारित किए जाने का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि किसी सामग्री को शेयर करना भी उसे अपलोड करने के समान ही है।

वीडियो के पीछे है पॉलिटिकल एजेंडा- याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि यह कदम अदालत की कार्यवाही को बदनाम करने की मंशा से उठाया गया। इस दौरान दिग्विजय सिंह के सोशल मीडिया पोस्ट को भी पढ़कर सुनाया गया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि केवल वही हिस्से साझा किए गए, जो एक विशेष राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं, जबकि पूरी कार्यवाही को नजरअंदाज किया गया। उनके अनुसार, कार्यवाही के चुनिंदा अंशों को प्रसारित करना एक बड़ी साजिश का हिस्सा है।

मेटा और गूगल ने दिया जवाब

मेटा और गगल की ओर से पेश वकील भी सुनवाई में शामिल हुए। अदालत ने उनसे पूछा कि क्या यह पता लगाया जा सकता है कि वीडियो सबसे पहले किसने अपलोड किया था। इस पर मेटा की ओर से कहा गया कि ऐसा पता लगाने के लिए उनके पास कोई स्पष्ट मैकेनिज्म उपलब्ध नहीं है, हालांकि संबंधित यूआरएल मौजूद हैं और कुछ यूज़र्स की पहचान की जा चुकी है। अदालत ने दोबारा वही सवाल दोहराया कि क्या शुरुआती अपलोडर की पहचान संभव है, जिस पर मेटा ने फिर से ‘नहीं’ में जवाब दिया।

बीएसआई और आईपी लॉग मौजूद

कंपनी ने स्पष्ट किया कि उनके पास बीएसआई और आईपी लॉग जैसी तकनीकी जानकारियाँ मौजूद रहती हैं। यदि किसी यूज़र का ईमेल आईडी या मोबाइल नंबर उपलब्ध कराया जाए, तो वे उससे जुड़ी जानकारी सुरक्षित रख सकते हैं और आवश्यक विवरण साझा कर सकते हैं। मेटा ने यह भी बताया कि अकाउंट बनाते समय यूज़र को ईमेल आईडी या मोबाइल नंबर देना अनिवार्य होता है। ऐसे में, संबंधित मोबाइल नंबर के आधार पर बीएसआई और आईपी लॉग से जुड़ी जानकारी हासिल की जा सकती है, जिसे जरूरत पड़ने पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

गूगल ने डिलीट किए यूआरएल

गूगल की ओर से बताया गया कि रजिस्ट्रार जनरल द्वारा उपलब्ध कराए गए 13 यूआरएल को हटाया जा चुका है। वहीं मेटा ने कहा कि जब भी कोई अवैध सामग्री सामने आती है, तो संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जाता है। इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि याचिका का उद्देश्य इस तरह के सभी वीडियो हटाना है क्या कंपनियां ऐसा करने में सक्षम हैं? अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने संबंधित यूआरएल का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत किया है। साथ ही, अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा कि यदि इस तरह का निर्देश जारी किया जाता है, तो क्या यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद सभी समान लिंक पर स्वतः लागू होगा।

खुद पहल करके ऐसी साम्रगी क्यों नहीं हटा सकते- हाईकोर्ट

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि इन प्लेटफॉर्म्स को अलग से सूचित करने की जरूरत क्यों पड़ती है, वे खुद पहल करके ऐसी सामग्री क्यों नहीं हटा सकते। अदालत ने कहा कि वह संस्थागत हितों को ध्यान में रखते हुए यह मुद्दा देख रही है। इस पर गूगल ने जवाब दिया कि जैसे ही संबंधित मंत्रालय से यूआरएल प्राप्त होते हैं, उन्हें तुरंत हटा दिया जाता है।

मेटा ने कोर्ट में दिया जवाब

वहीं मेटा ने कहा कि किसी भी वीडियो को अपलोड होते ही स्वतः हटाना संभव नहीं है क्योंकि वह अपने स्तर पर कंटेंट का मूल्यांकन नहीं कर सकते। इस पर अदालत ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में स्पष्ट दिशा-निर्देश लेकर आएं और यह भी बताएं कि वीडियो सबसे पहले किसने अपलोड किया था। हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जो भी सामग्री कानून का उल्लंघन करती है, उसे प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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