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Indian IPO Market: देश का प्राइमरी मार्केट अब तक के सबसे बड़े वर्षों में से एक के लिए तैयार हो रहा। 2026 में कई बड़ी कंपनियां निवेशकों को आकर्षित करेंगी। इक्विरस कैपिटल के अनुसार, भारत अगले साल आईपीओ से 20 अरब डॉलर जुटा सकता है। इसमें जियो, एनएसई, एसबीआई म्यूचुअल फंड, ओयो, फोनपे और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां शामिल हैं। नए साल में डीप और डायवर्सिफाइड कंपनियां पब्लिक मार्केट का रुख करेंगी। इनमें भारत के कुछ सबसे प्रभावशाली कंज्यूमर, टेक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन शामिल होंगे। भारत का कैपिटल मार्केट पहले ही बड़ा मील का पत्थर पार कर गया है।
इक्विरस के अनुसार, कंपनियों ने 2020 और 2025 के बीच आईपीओ से 5.39 लाख करोड़ रुपये जुटाए। यह 2000 से 2020 तक 20 साल में जुटाए गए 4.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। यह उछाल आधी संख्या में आईपीओ के साथ आया। मतलब बड़ी कंपनियां अब भारी संख्या में बाजार में आ रहीं और काफी अधिक पूंजी जुटा रही हैं। भारतीय मार्केट के विस्तार ने प्रमोटरों और प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टरों को अपनी हिस्सेदारी अधिक एफिशिएंट तरीके से मोनेटाइज करने को सक्षम बनाया है। ऑफर फॉर सेल (OFS) ट्रांजेक्शन में बढ़ोतरी हो रही है।
इकॉनोमिक्स टाइम्स में छपी रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार पीई एग्जिट का भी ट्रेंड बदल रहा है। इस साल जनवरी और अक्टूबर के बीच सेकेंडरी सेल्स का हिस्सा दोगुना होकर 16 फीसदी हो गया। जबकि, ब्लॉक डील, जो अब भी प्रमुख निकासी मोड 67% से घटकर 56% हो गया। 165 अरब डॉलर वैल्यू की निजी इक्विटी निवेश के मैच्योर होने और विनिवेश की ओर बढ़ने के साथ इस ट्रेंड के और मजबूत होने की पूरी संभावना है।
ओयो, फोनपे और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों से डिजिटल इकोनॉमी सेक्टर में लीडिंग की उम्मीद है। जियो, एनएसई और एसबीआई म्यूचुअल फंड की संभावित लिस्टिंग देश के प्राइमरी मार्केट के लिए नए मानक स्थापित कर सकती हैं। खासकर जियो भारतीय इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में से एक बन सकता है। जबकि, एनएसई की लंबे समय से प्रतीक्षित लिस्टिंग में संस्थागत रुचि बढ़ सकती है। इक्विरस के अनुसार ये बड़े इश्यू बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाएंगे और निवेशकों की भागीदारी बढ़ेगी।
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2021 में छोटे शहरों के आईपीओ, आईपीओ फंड के सिर्फ 4 फीसदी अकाउंटेड थे। 2024 में बढ़कर 27 फीसदी हुए। कैपिटल मार्केट में घरेलू भागीदारी भी बढ़ी है। पहली बार घरेलू संस्थागत निवेशकों के पास अब एनएसई लिस्टेड कंपनियों में एफआईआई की तुलना में अधिक हिस्सेदारी है, जो भारत के बचत भंडार की गहराई और मैच्योरिटी को दर्शाता है।






