शेरघाटी विधानसभा: गया की ऐतिहासिक भूमि पर सियासी दांव, NDA और महागठबंधन के बीच होगी कड़ी टक्कर
Bihar Assembly Elections: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में गया की शेरघाटी सीट पर एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। बेरोजगारी, पलायन और विकास जैसे मुद्दे इस बार अहम रोल निभाएंगे।
- Written By: अमन उपाध्याय
शेरघाटी विधानसभा, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Sherghati Assembly Constituency: बिहार की राजनीति में शेरघाटी विधानसभा सीट गया जिले में पड़ती है, जिसका महत्व न केवल स्थानीय बल्कि राज्यव्यापी है। गया का अपना एक अलग इतिहास है। यह मुख्य रूप से पितरों के मोक्ष और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है, क्योंकि यहां के विष्णु पद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण-चिह्न माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यह बौद्ध धर्म के लिए भी एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जहां भगवान बुद्ध को बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ था। गया धार्मिक महत्व के साथ-साथ अपनी पारंपरिक हस्तशिल्प कला के लिए भी जाना जाता है।
बिहार और बौद्ध धर्म का गहरा नाता
बौद्ध धर्म का वास्तविक उदय बिहार में हुआ। बुद्ध के उपदेशों, उनकी सरलतम जीवन शैली और हर जीवित प्राणी के प्रति उनकी करुणा के कारण यह धर्म पूरे विश्व में फैल गया। यह महत्वपूर्ण है कि बिहार राज्य का नाम भी ‘विहार’ शब्द से व्युत्पन्न है, जिसका तात्पर्य उन बौद्ध विहारों से है जो बिहार में फैले थे। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के सैकड़ों वर्ष बाद, मगध के मौर्य राजा अशोक (268 ईस्वी पूर्व से 232 ईस्वी पूर्व) ने बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान, सुदृढ़ीकरण व व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए अनेक प्रयास किए। अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं के लिए चैत्य और विहार बनवाए, जिससे इस क्षेत्र की महत्ता सदियों तक बनी रही।
शेरघाटी विधानसभा: इतिहास और पुनर्संरचना
शेरघाटी विधानसभा क्षेत्र का अस्तित्व 1957 में आया। यह सीट 1977 में समाप्त कर दी गई थी, लेकिन 2010 में फिर से इसकी स्थापना की गई। पहले चरण के चुनावों (1957-1972) में कांग्रेस ने 1957, 1962, और 1972 में जीत दर्ज की, जबकि 1967 और 1969 में क्रमशः जन क्रांति दल और एक निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे। 2010 में पुनर्स्थापना के बाद यह सीट Bihar Politics में एक प्रमुख केंद्र बन गई।
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चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, शेरघाटी की कुल आबादी 4,76,561 है, जिसमें पुरुषों की हिस्सेदारी 2,43,355 और महिलाओं की संख्या 2,33,206 है। कुल मतदाताओं की संख्या 2,80,514 है। इस तरह, कुल आबादी के हिसाब से यहां के मतदाताओं की संख्या का अनुपात महत्वपूर्ण है, जो हर चुनाव में अपनी मजबूत राय व्यक्त करते हैं।
बदलते राजनीतिक परिदृश्य और 2020 का उलटफेर
शेरघाटी सीट पर 2010 से लेकर अब तक दलगत राजनीति में बड़ा बदलाव देखा गया है:—
1- जदयू का प्रभुत्व: 2010 और 2015 के चुनावों में जदयू (JDU) ने जीत दर्ज कर इस सीट पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया था।
2- 2020 का उलटफेर: 2020 के चुनाव में यह सीट राजद (RJD) के खाते में चली गई। राजद की मंजु अग्रवाल ने जदयू के टिकट से दो बार चुनाव जीत चुके विनोद प्रसाद यादव को 16 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था। यह जीत महागठबंधन के लिए गया क्षेत्र में एक बड़ी सफलता थी।
आगामी Bihar Assembly Election 2025 में इस सीट पर मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) और विपक्षी महागठबंधन के प्रत्याशियों के बीच माना जा रहा है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर जन सुराज जैसे संभावित उम्मीदवार की उपस्थिति जातीय और स्थानीय समीकरणों को नया मोड़ दे सकती है।
प्रमुख चुनावी मुद्दे करेंगे फैसला
ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बावजूद, शेरघाटी आज भी कई बुनियादी चुनौतियों से जूझ रहा है। क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की कमी एक प्रमुख मुद्दा है, जिसके कारण बड़ी संख्या में युवा पलायन करने को मजबूर हैं। साथ ही बुनियादी ढाँचा एकदम बेकार है। शिक्षा, बिजली, सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष का कारण बना हुआ है। ये मुद्दे ही 2025 चुनाव में उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। शेरघाटी की जनता अब किसी भी दल के कोरे वादों पर भरोसा करने के बजाय, इन बुनियादी समस्याओं का स्थायी समाधान चाहती है।
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शेरघाटी विधानसभा सीट गया की राजनीति का एक ऐसा केंद्र है, जहां राजद और जदयू/भाजपा (एनडीए) के बीच वर्चस्व की लड़ाई जारी है। Bihar Politics में यह सीट गया जिले का मूड तय करती है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मंजु अग्रवाल अपनी सीट बचाने और एनडीए इसे वापस जीतने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे। बेरोजगारी और पलायन जैसे ज्वलंत मुद्दे इस कांटे की टक्कर में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
