डोनाल्ड ट्रंप, मुनीर और मोजतबा खामेनेई, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Why Pakistan Mediator US Iran War: फरवरी के अंत में ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद पश्चिम एशिया में एक व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की आशंकाएं तेज हो गई हैं। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच पाकिस्तान एक अप्रत्याशित मध्यस्थ के रूप में उभरा है, जो वाशिंगटन और तेहरान को बातचीत की मेज पर लाने का प्रयास कर रहा है। इस्लामाबाद इस उच्च-स्तरीय कूटनीति में इसलिए कदम रख पाया है क्योंकि उसके वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ बेहतर कार्य संबंध हैं और इस युद्ध के रुकने में उसके अपने हित भी जुड़े हैं।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने अमेरिका के एक 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव को ईरान तक पहुंचाया है। हालांकि ईरान ने इस अमेरिकी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है लेकिन तेहरान ने स्वीकार किया है कि उसने अपनी ओर से कुछ जवाबी प्रस्ताव भेजे हैं। तुर्की और मिस्र भी दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इन मध्यस्थता प्रयासों के कारण ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर बड़े हमलों की धमकियों को फिलहाल टाल दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस कूटनीतिक पहल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने राष्ट्रपति ट्रंप से हाल ही में बात की। मुनीर के अमेरिकी और ईरानी दोनों सेनाओं के साथ अच्छे संबंध माने जाते हैं जो इस स्थिति में एक सेतु का काम कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक इस पर कोई साफ नतीजा निकल नहीं पाया है।
इस युद्ध का वैश्विक और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है। ईरान ने Strait of Hormuz पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है और वहां एक ‘टोल बूथ’ व्यवस्था लागू करने की योजना बनाई है। इसके कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है जिससे पाकिस्तान को अपनी ईंधन कीमतों में 20% तक की वृद्धि करने पर मजबूर होना पड़ा है। पाकिस्तान की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है क्योंकि वह अपनी तेल और गैस की जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है।
ईरान पर हमलों के बाद पाकिस्तान के भीतर भी भारी विरोध प्रदर्शन हुए हैं। विशेष रूप से सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद कराची में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर भीड़ ने हमला किया और उसे आग लगाने की कोशिश की। इस हिंसा में देशभर में कम से कम 22 लोग मारे गए और 120 से अधिक घायल हुए हैं। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बन गई है क्योंकि वह पहले से ही अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान के साथ संघर्ष कर रहा है।
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पाकिस्तान के मध्यस्थता की बात करें तो रिपोर्ट के अनुसार, 1972 में पाकिस्तान ने ही अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की चीन यात्रा के लिए बैकचैनल संपर्क स्थापित करने में मदद की थी। हाल ही में पाकिस्तान ने अफगान तालिबान और अमेरिका के बीच दोहा वार्ता की सुविधा प्रदान की थी जिससे 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी का रास्ता साफ हुआ था। अब दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या पाकिस्तान एक बार फिर इतिहास दोहरा पाएगा और ईरान-अमेरिका के बीच महायुद्ध को टाल सकेगा।