खत्म हो रही नई स्टार्ट संधि, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
What is the New START Treaty: दुनिया के दो सबसे बड़े परमाणु शक्ति संपन्न देश अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाला आखिरी पुल भी अब टूट गया है। दशकों पुराने कूटनीतिक प्रयासों के बाद हुई ‘न्यू स्टार्ट’ संधि इस गुरुवार को समाप्त होने जा रही है। इस संधि के खत्म होने का अर्थ है कि अब दुनिया के दो सबसे बड़े परमाणु भंडारों पर कोई आपसी सीमा या नियंत्रण नहीं रहेगा।
साल 2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और दिमित्री मेदवेदेव द्वारा हस्ताक्षरित इस संधि ने दोनों देशों के तैनात सामरिक परमाणु हथियारों की संख्या को 1,550 और मिसाइलों या बॉम्बर्स की संख्या को 800 तक सीमित कर दिया था। यह पिछले पांच दशकों से चले आ रहे शस्त्र नियंत्रण के दौर की आखिरी कड़ी थी, जिसकी समाप्ति अब वैश्विक अस्थिरता को और बढ़ा सकती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संधि को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि अगर यह खत्म होती है, तो होने दो। हम एक बेहतर समझौता करेंगे। व्हाइट हाउस के अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप एक ऐसा नया समझौता चाहते हैं जिसमें चीन को भी शामिल किया जाए, जिसके पास वर्तमान में लगभग 600 परमाणु हथियार हैं।
दूसरी ओर, रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने बीजिंग की यात्रा के दौरान कहा कि यह एक नया क्षण है एक नई वास्तविकता है और हम इसके लिए तैयार हैं। हालांकि रूस ने संधि को एक साल के लिए बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था लेकिन रूसी दावों के अनुसार, अमेरिका की ओर से इसका कोई औपचारिक जवाब नहीं मिला।
फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका के पास कुल 5,177 और रूस के पास 5,459 परमाणु हथियार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संधि के समाप्त होने से दोनों देश अपने हथियारों के आधुनिकीकरण और विस्तार पर अरबों डॉलर खर्च करेंगे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चेतावनी दी है कि इस संधि का खत्म होना दशकों की कूटनीति को बेकार कर देगा और दुनिया को असुरक्षित बना देगा।
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हथियार नियंत्रण के पैरोकारों का मानना है कि न्यू स्टार्ट का अंत 1970 की परमाणु अप्रसार संधि (NPT) को भी खतरे में डाल सकता है। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद से परमाणु हथियारों को अब वैश्विक सुरक्षा में एक स्थिर कारक के रूप में नहीं देखा जा रहा है। बिना किसी निगरानी और डेटा साझाकरण के, दुनिया अब एक ऐसी ‘नई वास्तविकता’ में प्रवेश कर रही है जहां परमाणु युद्ध का जोखिम पहले से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक हो गया है।