टेंशन में पाकिस्तान और तुर्की, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Iran US War News In Hindi: हिंद महासागर इस समय अंतरराष्ट्रीय सैन्य गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन चुका है। दुनिया के सबसे उन्नत और घातक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर जिसे ‘समुद्री दानव’ कहा जा रहा है उसकी मौजूदगी ने पूरे क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया है।
जैसे-जैसे यह जंगी बेड़ा आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पाकिस्तान और तुर्की की धड़कनें तेज हो रही हैं। सैन्य जानकारों के अनुसार, अमेरिका पूरी तरह से युद्ध के मूड में दिखाई दे रहा है, जिससे इन दोनों इस्लामिक देशों को भारी नुकसान होने का डर सता रहा है।
अमेरिका के ईरान पर संभावित हमले के प्लान से सबसे ज्यादा पसीना पाकिस्तान को आ रहा है। पाकिस्तान को डर है कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश हुई, तो इसकी आग उसके बलूचिस्तान प्रांत तक पहुंच जाएगी। दरअसल, पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है। ईरान का सिस्तान क्षेत्र और पाकिस्तान का बलूचिस्तान आपस में जुड़े हुए हैं और दोनों तरफ बलूच आबादी रहती है।
पाकिस्तानी अधिकारियों को आशंका है कि ईरानी सीमा पर अस्थिरता होने से विद्रोहियों को हथियारों की तस्करी और शरण लेने के नए मौके मिल जाएंगे, जिससे बलूचिस्तान में चल रहा विद्रोह और उग्र हो सकता है। ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान किसी भी कीमत पर ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं चाहता क्योंकि यह उसके लिए विनाशकारी साबित होगा।
एक ओर जहां पाकिस्तान विद्रोह से डरा है, वहीं दूसरी ओर तुर्की को ईरान से आने वाले शरणार्थियों की चिंता सता रही है। तेहरान में अस्थिरता की आशंका को देखते हुए तुर्की ने अपनी 560 किलोमीटर लंबी सीमा को सुरक्षित करना शुरू कर दिया है। तुर्की रक्षा मंत्रालय ने सीमा पर 380 किलोमीटर की कंक्रीट की दीवार, 203 इलेक्ट्रो ऑप्टिकल टावर और गहरी खाइयां खोदकर एक ‘फिजिकल बैरियर सिस्टम’ तैयार किया है। इसके अलावा, ड्रोन और एयरक्राफ्ट के जरिए लगातार निगरानी की जा रही है ताकि किसी भी तरह के अवैध माइग्रेशन को रोका जा सके।
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इस पूरे घटनाक्रम ने तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो‘ की एकता की भी पोल खोल दी है। पाकिस्तान अपने परमाणु बम और तुर्की अपनी आधुनिक सेना के दम पर खुद को इस्लामिक दुनिया का मसीहा बताते रहे हैं, लेकिन ईरान के मुद्दे पर दोनों ने चुप्पी साध ली है। वहीं, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों ने ईरान पर हमले के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल करने देने से साफ इनकार कर दिया है। ऐसे में वह संघ, जो मुस्लिम देशों की एकजुटता का दावा करता था, एक साझा खतरे पर भी एकमत नहीं हो पाया है।