US कार्गो प्लेन के जरिए न्यूक्लियर रिएक्टर को ट्रांसपोर्ट किया, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
America Micro Nuclear Reactor: विज्ञान और सैन्य लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में अमेरिका ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग और रक्षा विभाग ने पहली बार एक छोटा न्यूक्लियर रिएक्टर कैलिफोर्निया से यूटा तक एक विशाल C-17 कार्गो प्लेन के जरिए सफलतापूर्वक ट्रांसपोर्ट किया है। इस ऐतिहासिक कदम का उद्देश्य यह दिखाना है कि भविष्य में परमाणु ऊर्जा को कितनी तेजी से और सुरक्षित तरीके से कहीं भी तैनात किया जा सकता है।
यह रिएक्टर कैलिफोर्निया की कंपनी ‘वैलर एटॉमिक्स’ द्वारा तैयार किया गया है, जिसे ‘वॉर्ड माइक्रोरिएक्टर’ नाम दिया गया है। इस विशेष उड़ान की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और रक्षा विभाग के अंडर सेक्रेटरी माइकल डफी इस फ्लाइट में मौजूद थे। रिएक्टर को कैलिफोर्निया के मार्च एयर रिजर्व बेस से उड़ाकर यूटा के हिल एयर फोर्स बेस तक ले जाया गया।
सुरक्षा के लिहाज से फिलहाल इसे बिना न्यूक्लियर फ्यूल के उड़ाया गया था। माइकल डफी के अनुसार, यह तकनीक आने वाले समय में सैन्य बेस और दुनिया के सबसे दुर्गम इलाकों में तैनात सैनिकों को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगी और उन्हें युद्ध में अधिक मजबूत टूल्स प्रदान करेगी।
आकार की बात करें तो यह माइक्रोरिएक्टर एक मिनीवैन से थोड़ा ही बड़ा है, लेकिन इसकी क्षमता अद्भुत है। यह अधिकतम 5 मेगावाट बिजली पैदा करने में सक्षम है जो करीब 5,000 घरों को रोशन करने के लिए पर्याप्त है। ट्रंप प्रशासन के तहत घरेलू परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत इस प्रोजेक्ट को काफी महत्व दिया जा रहा है। कंपनी के सीईओ यशायाह टेलर ने बताया कि इसकी टेस्टिंग जल्द ही 100 किलोवाट से शुरू होकर धीरे-धीरे पूरी क्षमता तक पहुंचेगी।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग की योजना है कि 4 जुलाई 2026 तक तीन ऐसे माइक्रोरिएक्टर पूरी तरह ‘रेडी मोड’ में तैयार कर लिए जाएं। उम्मीद की जा रही है कि 2027 तक इसका परीक्षण व्यावसायिक स्तर पर बिजली बेचने के लिए शुरू हो जाएगा और 2028 तक यह तकनीक पूरी तरह बाजार में उपलब्ध होगी।
यह भी पढ़ें:- आज रात मुंबई पहुंचेंगे फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों, रक्षा से लेकर AI तक; PM मोदी के साथ सजेगा महामंच
हालांकि, इस प्रोजेक्ट को लेकर कुछ विशेषज्ञ सवाल भी उठा रहे हैं। ‘यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स’ के एडविन लाइमैन का मानना है कि इन छोटे रिएक्टरों से पैदा होने वाली बिजली बड़े प्लांट या सोलर-विंड एनर्जी की तुलना में काफी महंगी होगी। इसके अलावा, परमाणु कचरे का निपटारा भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है जिसके लिए सरकार यूटा जैसे राज्यों के साथ रीप्रोसेसिंग सेंटर बनाने पर चर्चा कर रही है।