मोजतबा खामेनेई और डोनाल्ड ट्रंप, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
US Iran War Latest News: साल 2003 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक एयरक्राफ्ट कैरियर पर ‘मिशन पूरा हुआ’ का बैनर लगाकर इराक युद्ध में जीत का ऐलान किया था लेकिन वह जंग अगले नौ साल तक खिंची थी। आज साल 2026 में इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है।
जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान में वैसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं। 28 फरवरी को ईरान पर शुरू हुए हमले के बाद से ट्रंप ने एक महीने में 12 बार जीत का दावा किया है लेकिन अब उन्होंने अचानक तीन और हफ्तों का समय मांगा है।
पेंटागन की रिपोर्ट्स के अनुसार, इस युद्ध में अब तक कम से कम 13 से 15 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं और करीब 350 घायल हुए हैं। सैन्य साजो-सामान के मामले में भी अमेरिका को बड़ा झटका लगा है। तुर्की की न्यूज एजेंसी के मुताबिक, ईरान के मिसाइलों और ड्रोनों ने अमेरिका के 1.4 अरब से 2.9 अरब डॉलर के हथियार तबाह कर दिए हैं। यहां तक कि अमेरिका के अपने ही विमान ‘फ्रेंडली फायर’ का शिकार होकर गिर रहे हैं।
इस सैन्य गतिरोध का असर सीधे ट्रंप की लोकप्रियता पर पड़ रहा है। ताजा सर्वे बताते हैं कि ट्रंप की मंजूरी दर गिरकर मात्र 35% रह गई है। उनके अपने समर्थक (MAGA गुट) भी अब ‘अमेरिका फर्स्ट’ के वादे पर सवाल उठा रहे हैं।
जंग के मैदान से दूर, आम अमेरिकियों की जेब पर इसका गहरा असर पड़ा है। होर्मुज की खाड़ी में तनाव के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें चार साल में पहली बार 4 डॉलर प्रति गैलन को पार कर चुकी हैं। इसके परिणामस्वरूप माल ढुलाई महंगी हो गई है और ट्रक चालकों ने अपने ट्रक खड़े करना शुरू कर दिया है जिससे किराने के सामान और अन्य लागतों में भारी बढ़ोतरी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप इन तीन हफ्तों का उपयोग एक ‘प्रतीकात्मक जीत’ गढ़ने के लिए करना चाहते हैं। उनके रणनीतिक लक्ष्यों में ईरान के मिसाइल भंडारों को खत्म करना और होर्मुज की खाड़ी को खुलवाना शामिल है।
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सबसे चौंकाने वाली योजना ईरानी यूरेनियम को चुराने या निकालने की चर्चा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप ईरान के भूमिगत बंकरों से समृद्ध यूरेनियम निकालकर दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोक दिया है। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञ इसे ‘बड़े जोखिम के बदले बहुत कम फायदा’ बता रहे हैं और आशंका जता रहे हैं कि इससे जमीनी जंग और अधिक घातक हो सकती है।