चीन अमेरिका तनाव, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Trump Greenland Claim: ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया की दो महाशक्तियों, अमेरिका और चीन के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। ट्रंप की ‘सैन्य कार्रवाई’ और ‘पूर्ण मालिकाना हक’ की चेतावनी पर कड़ा पलटवार करते हुए चीन ने अमेरिका को अपने निजी हितों के लिए दूसरे देशों का इस्तेमाल बंद करने की सख्त नसीहत दी है।
न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वे केवल पुराने समझौतों या पट्टों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि पूरे ग्रीनलैंड का मालिकाना हक चाहते हैं। उनके अनुसार, ‘मालिकाना हक वह चीज देता है जो पट्टे या संधि से नहीं मिल सकती।’ उल्लेखनीय है कि वेनेजुएला के सैन्य ऑपरेशन में निकोलस मादुरो को बंधक बनाने के बाद ट्रंप का मनोबल काफी बढ़ा हुआ है और उन्होंने ग्रीनलैंड के लिए सैन्य कार्रवाई तक के संकेत दिए हैं।
ट्रंप के इस रुख से बीजिंग बुरी तरह भड़क गया है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने सोमवार को एक बयान जारी कर अमेरिका को खरी-खरी सुनाई। उन्होंने कहा कि अमेरिका को दूसरे देशों का बहाना बनाकर अपने फायदे नहीं उठाने चाहिए और सभी देशों के अधिकारों व स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। चीन का तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामूहिक लाभ से जुड़ा है और वहां चीन की गतिविधियां पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हैं।
चीन ने 2018 में खुद को ‘आर्कटिक के पास का देश’ (Near-Arctic State) घोषित किया था, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना है। बीजिंग ने अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के तहत एक ‘पोलर सिल्क रोड’ बनाने की योजना भी पेश की है। ट्रंप का मानना है कि चीन और रूस को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से रोकने के लिए वाशिंगटन का वहां काबिज होना जरूरी है। हालांकि, अमेरिका पहले से ही 1951 की एक संधि के तहत वहां सैन्य अड्डे संचालित कर रहा है, लेकिन अब ट्रंप इससे कहीं आगे पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं।
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ट्रंप के इस विस्तारवादी रुख का न केवल चीन, बल्कि डेनमार्क भी विरोध कर रहा है। डेनमार्क ने इस मामले पर भारत का समर्थन मांगा है और ट्रंप पर बरसते हुए कहा है कि उन्हें ‘अमेरिका से खतरा है’। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रंप अपने रुख पर अड़े रहे, तो यह आर्कटिक क्षेत्र की शांति और स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।