कॉन्सेप्ट फोटो (डिजाइन)
Israel-Iran Tension: इजरायल और अमेरिकी अटैक के बाद ईरान ने भी जवाबी हमला बोल दिया है। ईरान ने न केवल इजरायल को निशाना बनाया है, बल्कि मिडिल ईस्ट के उन देशों पर भी हमला बोला है, जहां अमेरिकी रक्षा तंत्र या फिर एयरबेस मौजूद हैं। मिडिल-ईस्ट में मौजूद अमेरिकी बेस पर ईरान मिसाइलों से हमला कर रहा है।
आपको बता दें कि चीन की सैटेलाइट्स ने इस बेसों की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थी। जिन्हें देखकर पता चलता है कि अमेरिकी सैन्य अड्डों पर लड़ाकू विमानों, टैंकरों और मिसाइल डिफेंस सिस्टम की संख्या तेजी से बढ़ाई गई। प्लैनेट लैब्स और रॉयटर्स की तस्वीरों में कतर, जॉर्डन और सऊदी अरब के अड्डों पर बदलाव साफ दिख भी रहे थे।
ईरान के जवाबी हमले के बीच लोगों के मन में सवाल यह उठ रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया है? मिडिल ईस्ट में अमेरिका ने किन देशों में अपने सैन्य ठिकाने बना रखे हैं? क्या कोई देश किसी अन्य देश में अपने सैन्य ठिकाने बना सकता है और बना सकता है तो कैसे? चलिए इन सारे सवालों के जवाब एक जगह जान लेते हैं।
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान से न्यूक्लियर डील चाहते हैं, लेकिन वह बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर भी रोक की मांग कर रहे हैं। ईरान ने साफ मना कर दिया है और जंग शुरू हो गई है। जवाब में ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नेवल बेस को निशाना बनाया गया है। इसके साथ ही यूएई, कतर, कुवैत, सऊदी अरब, जॉर्डन में भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।
अल उदीद एयर बेस कतर: यह 24 हेक्टेयर का एयर बेस यूएस सेंट्रल कमांड का हेडक्वार्टर है। यह कमांड मिस्र से लेकर कज़ाकिस्तान तक के बड़े इलाके में यूएस मिलिट्री ऑपरेशन्स की देखरेख करता है। यहां करीब 10,000 यूएस सैनिक तैनात हैं। जनवरी में, यूएस सेंट्रल कमांड ने यहां एक नया कोऑर्डिनेशन सेल (MEAD-CDOC) खोला, जो इलाके के एयर और मिसाइल डिफेंस को मज़बूत करेगा।
मुवफ्फाक अल साल्टी एयर बेस जॉर्डन: जॉर्डन की राजधानी अम्मान से 100 किमी उत्तर-पूर्व में अजराक मेंमुवफ्फाक अल साल्टी एयर बेस स्थित है। यह यूएस एयर फोर्स सेंट्रल के 332वें एयर एक्सपेडिशनरी विंग का घर है। यह एयर बेस लेवेंट में मिशन करता है।
फिफ्थ फ्लीट नेवल हेडक्वार्टर बहरीन: बहरीन यूएस नेवी के फिफ्थ फ्लीट का हेडक्वार्टर है। यह फ्लीट लाल सागर, अरब सागर और हिंद महासागर के कुछ हिस्सों के लिए ज़िम्मेदार है। यह बेस यूएस मैरीटाइम सिक्योरिटी के लिए बहुत ज़रूरी है। यहीं पर ईरानी हमले का वीडियो सामने आया है।
प्रिंस सुल्तान एयर बेस सऊदी अरब: सऊदी अरब में भी अमेरिका ने अपना एयर बेस बना रखा है। रियाद से 60 किमी दक्षिण में प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर तमाम अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। यहीं पर पैट्रियट मिसाइल बैटरी और टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस सिस्टम हैं।
अली अल सलेम एयर बेस कुवैत: कुवैत में कई बड़े मिलिट्री बेस हैं। कैंप आरिफजान यूएस आर्मी सेंट्रल का हेडक्वार्टर है। अली अल सलेम एयर बेस इराक बॉर्डर से करीब 40 किलोमीटर दूर है। अपने अलग-थलग और मुश्किल इलाके की वजह से इसे “द रॉक” के नाम से जाना जाता है। कैंप ब्यूहरिंग 2003 के इराक युद्ध के दौरान बनाया गया था और यह इराक और सीरिया में तैनात यूएस सेना के लिए एक स्टेजिंग पोस्ट का काम करता है।
अल धफरा एयर बेस UAE: यह एयर बेस UAE एयर फोर्स के साथ शेयर किया जाता है। यह यूएस एयर फोर्स के लिए एक ज़रूरी बेस है, जो ISIS के खिलाफ ऑपरेशन और इलाके में टोही मिशन में मदद करता है। दुबई का जेबेल अली पोर्ट कोई फॉर्मल बेस नहीं है, लेकिन यह मिडिल ईस्ट में यूएस नेवी का सबसे बड़ा पोर्ट है। यूएस के एयरक्राफ्ट कैरियर और दूसरे जहाज रेगुलर यहां आते-जाते रहते हैं।
अल असद एयर बेस इराक: इराक का अल असद एयर बेस पश्चिमी अनबर प्रांत में है। यह इराकी सुरक्षा बलों को सपोर्ट करता है और NATO मिशन में योगदान देता है। 2020 में, ईरान ने ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए इस पर मिसाइल हमला किया था। उत्तरी इराक के कुर्दिस्तान इलाके में, एरबिल एयर बेस है, जो यूएस और गठबंधन सेनाओं के लिए ट्रेनिंग और इंटेलिजेंस शेयरिंग हब है।
इनसिरलिक एयर बेस तुर्की: तुर्की और अमेरिका मिलकर दक्षिणी अदाना प्रांत में इनसिरलिक एयर बेस चलाते हैं। इसमें यूएस के न्यूक्लियर हथियार हैं और यह ISIS के खिलाफ गठबंधन को सपोर्ट करता है। तुर्की में 1,465 यूएस सैनिक तैनात हैं।
दूसरे वर्ल्ड वॉर में जर्मनी और जापान को हराने में मदद करने के बाद से यूनाइटेड स्टेट्स दुनिया भर में मिलिट्री बेस बनाने में स्ट्रेटेजिक रूप से एक्टिव रहा है। क्योंकि उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है और वह मिलिट्री डिफेंस और मानवीय मदद देने में दूसरे देशों के साथ एक्टिव रूप से सहयोग करता है, इसलिए दूसरे देशों को वहां यूएस मिलिट्री बेस होने पर कोई एतराज़ नहीं है।
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किसी दूसरे देश में सैन्य ठिकाना बनाना उस देश के साथ समझौते के जरिए होता है। सैन्य ठिकाना बनने पर भी जमीन मेजबान देश की संप्रभुता का हिस्सा रहती है। इसके फायदे के तौर पर स्थानीय अर्थव्यवस्था को धन और सुरक्षा भी मिलती है। जबकि सैन्य ठिकाना बनाने वाले देश का दुनिया में प्रभुत्व और ताकत दिखाई देती है।