पाकिस्तान में पोलियो की दवा पिलाती टीम, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
Pakistan News In Hindi: पाकिस्तान के अशांत उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा से एक बेहद दुखद और शर्मनाक घटना सामने आई है। मंगलवार, 3 फरवरी 2026 को अज्ञात बंदूकधारियों ने पोलियो टीकाकरण अभियान में जुटी एक टीम को अपना निशाना बनाया। यह हमला उत्तरी वजीरिस्तान जिले की मीर अली तहसील में हुआ, जो कि अफगानिस्तान की सीमा से सटा हुआ इलाका है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, हमलावरों ने उस समय अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी जब पोलियो कार्यकर्ता घर-घर जाकर बच्चों को वैक्सीन पिला रहे थे। इस हमले में टीकाकरण टीम की सुरक्षा के लिए तैनात एक पुलिसकर्मी को गोलियां लगीं जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना को अंजाम देने के बाद हमलावर मौके से फरार होने में सफल रहे।
पुलिस दल ने तुरंत पूरे इलाके को घेर लिया है और हमलावरों की तलाश में एक व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया गया है। हालांकि, अभी तक किसी भी आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन इस क्षेत्र में सक्रिय स्थानीय आतंकी समूह अक्सर ऐसी वारदातों को अंजाम देते रहे हैं।
पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन अभियान लंबे समय से धार्मिक कट्टरता और निराधार अफवाहों के कारण चुनौतियों का सामना कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान और पड़ोसी देश अफगानिस्तान दुनिया के केवल ऐसे दो देश बचे हैं जहां वाइल्ड पोलियो वायरस अभी भी सक्रिय है। आतंकी समूह जैसे ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ (TTP) अक्सर पोलियो वैक्सीन को एक ‘पश्चिमी साजिश’ बताते हैं।
उनका दावा होता है कि यह वैक्सीन मुस्लिम बच्चों की नसबंदी करने का एक माध्यम है। ऐसी ही गलत जानकारियों और षड्यंत्रों के कारण 2012 से अब तक लगभग 200 से अधिक पोलियो कर्मियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों की जान जा चुकी है।
इन खतरों के बावजूद, पाकिस्तानी सरकार WHO, UNICEF और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर देश को पोलियो मुक्त बनाने की कोशिशों में जुटी है। हर अभियान में हजारों महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता अपनी जान जोखिम में डालकर काम करती हैं जिन्हें अक्सर पुलिस और लेवी फोर्स की सुरक्षा दी जाती है।
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मीर अली में हुए इस ताजा हमले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान में पोलियो कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर जागरूकता नहीं फैलेगी तब तक पूर्ण उन्मूलन नामुमकिन है।