डेनमार्क सेना ग्रीनलैंड, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
Denmark US dispute Greenland: आर्कटिक के रणनीतिक द्वीप ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच कूटनीतिक दरार गहरी होती जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताए जाने के जवाब में डेनमार्क ने वहां अपनी सैन्य उपस्थिति को और मजबूत करने का फैसला किया है।
सोमवार, 19 जनवरी 2026 को बड़ी संख्या में डेनिश सैनिकों की एक टुकड़ी ग्रीनलैंड पहुंची जिसे कोपेनहेगन की ओर से वॉशिंगटन के दबाव के खिलाफ एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।
डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, डेनिश सैनिक ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक के उत्तर में स्थित कंगेरलुसुआक में तैनात किए जा रहे हैं। इस सैन्य दल की अगुवाई खुद डेनिश सेना प्रमुख पीटर बॉयसेन कर रहे हैं। इस तैनाती को ‘महत्वपूर्ण योगदान’ करार दिया गया है, जबकि इससे पहले भी वहां लगभग 200 डेनिश सैनिक तैनात थे। ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य का एक स्वशासित हिस्सा है, जिसकी रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने अमेरिका की बयानबाजी का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि द्वीप किसी भी बाहरी दबाव में नहीं आएगा और ग्रीनलैंड की स्थिति पर बार-बार सवाल उठाना ‘अपमानजनक और अस्वीकार्य’ है।
वहीं, ग्रीनलैंड की मंत्री नाजा नथानिएलसन ने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में लिखा कि ग्रीनलैंड भू-राजनीतिक टकराव के बजाय शांतिपूर्ण विकास चाहता है और डेनमार्क के साथ बने रहने के उनके फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए।
यह विवाद केवल डेनमार्क तक सीमित नहीं रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और नॉर्वे जैसे कई यूरोपीय देशों के सैन्यकर्मी भी ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ अभ्यास के लिए ग्रीनलैंड पहुंच चुके हैं। इस सैन्य लामबंदी के जवाब में डोनाल्ड ट्रंप ने आर्थिक दबाव बनाना शुरू कर दिया है। 17 जनवरी को ट्रंप ने ग्रीनलैंड विवाद का हवाला देते हुए कई यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की, जिसे भविष्य में बढ़ाकर 25% तक किया जा सकता है।
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डेनमार्क समेत कई यूरोपीय देशों के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड पहले से ही नाटो के सामूहिक सुरक्षा तंत्र का हिस्सा है और इसकी सुरक्षा किसी एक देश की नहीं बल्कि सभी सहयोगी देशों की साझा जिम्मेदारी है। ट्रंप के बयानों के बाद ग्रीनलैंड में व्यापक जनआक्रोश देखने को मिला। हजारों लोग सड़कों पर उतर आए, हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर प्रदर्शन किया और ‘ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है’ जैसे नारे लगाकर अपना विरोध दर्ज कराया।