US-ईरान जंग से डरा चीन? न्यूक्लियर अड्डों के पास बना रहा विशाल मिलिट्री बेस, सैटेलाइट तस्वीरों ने खोला राज
China Building Military Base: चीन अपनी न्यूक्लियर फैसिलिटी के पास बड़े पैमाने पर मिलिट्री बेस बना रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन US-ईरान जंग से सबक लेकर तैयारी चल रही है।
- Written By: अमन उपाध्याय
चीन न्यूक्लियर अड्डों के पास बना रहा मिलिट्री बेस, फोटो ( सो. Reuters)
China Building Military Base Nuclear Facility: वैश्विक महाशक्ति बनने की होड़ में चीन अपनी सैन्य और परमाणु क्षमताओं को बड़े स्तर पर ले जा रहा है। हाल ही में आई सैटेलाइट तस्वीरों ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
इन तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन अपनी न्यूक्लियर फैसिलिटी के पास बड़े पैमाने पर नए मिलिट्री बेस और अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। रक्षा गलियारों में यह माना जा रहा है कि चीन यह कदम भविष्य में होने वाले किसी भी संभावित परमाणु युद्ध की तैयारी के रूप में उठा रहा है।
अमेरिका-ईरान जंग से लिया सबक
विशेषज्ञों का कहाना है कि चीन शायद अमेरिका-ईरान के बीच हाल के वर्षों में उपजे तनाव और सैन्य रणनीतियों से सीख ले रहा है। चीन की रणनीति यह है कि यदि भविष्य में अमेरिका के साथ कोई संघर्ष होता है, तो उसका सुरक्षा घेरा इतना मजबूत हो कि अमेरिका का पहला हमला चीन की जवाबी कार्रवाई की क्षमता को नष्ट न कर सके। इसी उद्देश्य के लिए चीन अपने परमाणु मिसाइल अड्डों के चारों ओर सुरक्षा की कई परतें तैयार कर रहा है।
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सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा मिसाइल नेटवर्क
रॉयटर्स द्वारा शेयर की गई सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, चीन अपने सुदूर न्यूक्लियर मिसाइल क्षेत्रों के पास लॉन्चिंग पैड, बंकर और संचार सुविधाओं का एक व्यापक नेटवर्क तैयार कर रहा है।
तस्वीरों में 80 से अधिक ऐसी जगहों की पहचान की गई है, जिनका उपयोग चीन के बढ़ते मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और एयर डिफेंस सिस्टम के बेड़े द्वारा किया जा सकता है। यह बुनियादी ढांचा चीन की उन मिसाइलों को सुरक्षा प्रदान करेगा जो सबसे लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं।
अष्टकोणीय कॉम्प्लेक्स और भारी बुनियादी ढांचा
चीनी रेगिस्तान, विशेष रूप से पूर्वी शिनजियांग में पिछले छह सालों के दौरान दो बड़े अष्टकोणीय (octagonal) कॉम्प्लेक्स बनाए गए हैं। ये कॉम्प्लेक्स हामी न्यूक्लियर मिसाइल फील्ड के दक्षिण-पश्चिम में स्थित हैं। इसके अलावा, लोप नूर न्यूक्लियर टेस्टिंग साइट के पास एक तीसरा अष्टकोणीय कॉम्प्लेक्स भी निर्माणाधीन है।
सांकेतिक AI फोटो
इन परिसरों में न केवल सैनिकों के रहने की जगह है, बल्कि बड़े सैन्य वाहनों के लिए पार्किंग, हथियार भंडारण के लिए मजबूत बंकर, और यहां तक कि रेल टर्मिनल और एयरपोर्ट भी शामिल हैं। इन सुविधाओं को कच्ची सड़कों और नालियों के एक जटिल नेटवर्क के जरिए रेगिस्तान के अंदर तक जोड़ा गया है।
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रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इन अड्डों पर केवल हथियार ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सैटेलाइट कम्युनिकेशन की आधुनिक सुविधाएं भी मौजूद हैं। तस्वीरों में सैटेलाइट डिश, बड़े टावर और माइक्रोवेव संचार की संभावना वाली चीजें भी देखी गई हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इन ठिकानों का इस्तेमाल सड़क पर चलने वाले इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चरों के लिए किया जा सकता है, जो चीन की ‘सेकंड स्ट्राइक’ क्षमता को सुनिश्चित करते हैं।
ताइवान संकट और ‘नो फर्स्ट यूज’ पॉलिसी
चीन ने आधिकारिक तौर पर भारत की तरह ‘नो फर्स्ट यूज’ की नीति अपनाई हुई है। हालांकि, ताइवान को लेकर बढ़ते विवाद और अमेरिकी हस्तक्षेप की आशंका के बीच चीन की यह सैन्य तैयारी कुछ और ही संकेत दे रही है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहले ही चेतावनी दी है कि ताइवान विवाद को सही से न सुलझाने पर दोनों देश खतरनाक मोड़ पर पहुंच सकते हैं। ऐसे में ये नए मिलिट्री बेस चीन को एक मजबूत सौदेबाजी की स्थिति और सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
