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Explainer: सुप्रीम कोर्ट का फैसला या रणनीतिक वजह, यूपी में क्यों टला पंचायत चुनाव? कौन सा खेल खेल रही सरकार
- Written By: अक्षय साहू
UP Panchayat Chunav: योगी सरकार ने पंचायत चुनाव को 6 महीने के लिए टाल दिया है। इसे अब 2027 विधानसभा चुनाव के बाद कराए जाने की संभावना है। विपक्ष ने इसे राजनीतिक रणनीति बताकर सरकार पर निशाना साधा है।

यूपी में पंचायत चुनाव 6 महीने के लिए टला (सोर्स- सोशल मीडिया)
UP Panchayat Chunav Postponed: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, पक्ष से लेकर विपक्ष ने अपनी सियासी बिसात बिछाना शुरु कर दिया है। इसी बीच योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव तक टालने के संकेत दिए हैं। पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव के फाइनल से पहले सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा था। लेकिन अब सरकार के फैसले ने सियासी सस्पेंस को और बढ़ा दिया है।
पंचायत चुनाव योगी सरकार के लिए अपनी ताकत दिखाना का सबसे अच्छा मौका था। इसमें बड़ी जीत दर्ज करके सरकार विपक्षी पार्टियों को संदेश दे सकती थी, कि जनता का बहुमत अब भी उनके पक्ष में हैं। लेकिन सरकार के हालिया फैसलों से लगता है कि वो इसे 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद कराना चाहते हैं। आइए आपको बताते हैं कि योगी सरकार ने यह फैसला क्यों किया? सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले ने फंसाया पेंच? प्रधान के नहीं होने पर ग्राम पंचायतों का कामकाज कौन संभालेगा?
प्रशासनिक बदलाव में प्रधानों की नई भूमिका
उत्तर प्रदेश में साल 2021 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के जरिए 58,189 ग्राम प्रधान चुने गए थे। इन प्रधानों का आधिकारिक कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया है। सामान्य तौर पर जब प्रधानों का कार्यकाल खत्म होता है और अगर चुनाव नहीं हो पाते हैं, तब सरकार सहायक विकास अधिकारियों (ADO) को प्रशासक नियुक्त करती है। लेकिन इस बार योगी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ग्राम प्रधानों को ही 6 महीने के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया है।
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ग्राम प्रधान 6 महीने के लिए प्रशासक नियुक्त (सोर्स- सोशल मीडिया)
हालांकि, इस दौरान उनके पास नाममात्र की शक्तियां रहेंगी। ग्राम प्रधान कोई भी नीतिगत फैसला खुद नहीं ले सकेंगे। इसके अलावा किसी भी खास परिस्थिति या बड़े काम के लिए उन्हें प्रस्ताव बनाकर जिलाधिकारी (DM) को भेजना होगा और उनकी मंजूरी के बाद ही कार्य आगे बढ़ सकेगा। सरकार का यह कदम स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर को थामने और प्रधानों को अपने पाले में बनाए रखने की एक कोशिश मानी जा रही है।
पंचायत चुनाव में क्यों देरी कर रही सरकार?
पंचायत चुनावों में देरी का सबसे बड़ा तकनीकी और कानूनी कारण अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की प्रक्रिया का माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूले के पालन के लिए योगी कैबिनेट ने हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दी है।
क्या है ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूला?
निकाय चुनावों में ‘ट्रिपल टेस्ट’ वह नियम है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी बताया है। इसके तीन मुख्य चरण होते हैं।
यूपी में पंचायत चुनाव के लिए ट्रिपल टेस्ट जरूरी (AI जनरेटेड फोटो)
- पहला: राज्य सरकार एक विशेष आयोग बनाती है जो यह अध्ययन करता है कि स्थानीय निकायों में OBC को कितना राजनीतिक आरक्षण मिलना चाहिए।
- दूसरा: उसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण का प्रतिशत तय किया जाता है।
- तीसरा: यह सुनिश्चित किया जाता है कि SC, ST और OBC मिलाकर कुल आरक्षण 50% से अधिक न हो। अगर ये प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो कोर्ट आरक्षण को अवैध मान सकता है।
योगी सरकार ने पहले चरण के तहत आयोग का गठन कर सर्वे का काम शुरू कर दिया है। आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद ही ट्रिपल टेस्ट के तीसरे चरण को लेकर फैसला किया जाएगा।
अब क्योंकि जब तक यह कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया संपन्न होगी, तब तक साल 2026 समाप्त हो चुका होगा और प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनावों की दहलीज पर होगा। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पंचायत चुनाव करवापाना व्यावहारिक रूप से असंभव नजर आता है।
किसी भी जोखिम से बचना चाहती है भाजपा
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि योगी सरकार ने पंचायत चुनाव को टालने का फैसला सिर्फ कानूनी कारणों से नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे रणनीतिक कारण भी है। सरकार मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहती है।
- 2021 का सबक: 2021 के पंचायत चुनावों में भाजपा को समाजवादी पार्टी (सपा) से कड़ी चुनौती मिली थी और कई जिलों में निर्दलीय उम्मीदवारों का दबदबा रहा था। सरकार नहीं चाहती कि 2027 के मुख्य चुनाव से पहले किसी भी तरह का नकारात्मक संदेश या ‘एंटी-इंकंबेंसी’ का माहौल बने।
- भीतरघात का खतरा: पंचायत चुनाव पार्टी सिंबल के बजाय स्थानीय रसूख पर लड़े जाते हैं। अक्सर एक ही सीट पर पार्टी के कई कार्यकर्ता दावेदारी करते हैं। अगर चुनाव अभी होते, तो टिकट न मिलने वाले कार्यकर्ता बागी हो सकते थे, जिसका सीधा नुकसान 2027 के विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता था।
जनता का सामना करने से डर रही भाजपा: सपा
योगी आदित्यनाथ सरकार के इस फैसले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर हमला बोला है। सपा ने कहा है कि सरकार अपनी खिसकती जमीन से डर गई है और ओबीसी आरक्षण के नाम पर केवल समय काट रही है। सपा का आरोप है कि भाजपा जनता का सामना करने से बच रही है।
समाजवादी पार्टी ने योगी सरकार पर लगाए आरोप (सोर्स- सोशल मीडिया)
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वहीं, सरकार के सहयोगी दल, जैसे ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद, ने भी पहले ही संकेत दे दिए थे कि बिना पूर्ण तैयारी के चुनाव कराना मुश्किल होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्ता पक्ष के भीतर चुनावों को टालने पर एक मौन सहमति थी। हालांकि, पंचायत चुनावों के टलने से उन हजारों उम्मीदवारों को गहरा झटका लगा है जो पिछले कई महीनों से तैयारी कर रहे थे।
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