

UP Panchayat Chunav Postponed: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, पक्ष से लेकर विपक्ष ने अपनी सियासी बिसात बिछाना शुरु कर दिया है। इसी बीच योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव तक टालने के संकेत दिए हैं। पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव के फाइनल से पहले सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा था। लेकिन अब सरकार के फैसले ने सियासी सस्पेंस को और बढ़ा दिया है।
पंचायत चुनाव योगी सरकार के लिए अपनी ताकत दिखाना का सबसे अच्छा मौका था। इसमें बड़ी जीत दर्ज करके सरकार विपक्षी पार्टियों को संदेश दे सकती थी, कि जनता का बहुमत अब भी उनके पक्ष में हैं। लेकिन सरकार के हालिया फैसलों से लगता है कि वो इसे 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद कराना चाहते हैं। आइए आपको बताते हैं कि योगी सरकार ने यह फैसला क्यों किया? सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले ने फंसाया पेंच? प्रधान के नहीं होने पर ग्राम पंचायतों का कामकाज कौन संभालेगा?
उत्तर प्रदेश में साल 2021 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के जरिए 58,189 ग्राम प्रधान चुने गए थे। इन प्रधानों का आधिकारिक कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया है। सामान्य तौर पर जब प्रधानों का कार्यकाल खत्म होता है और अगर चुनाव नहीं हो पाते हैं, तब सरकार सहायक विकास अधिकारियों (ADO) को प्रशासक नियुक्त करती है। लेकिन इस बार योगी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ग्राम प्रधानों को ही 6 महीने के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया है।
हालांकि, इस दौरान उनके पास नाममात्र की शक्तियां रहेंगी। ग्राम प्रधान कोई भी नीतिगत फैसला खुद नहीं ले सकेंगे। इसके अलावा किसी भी खास परिस्थिति या बड़े काम के लिए उन्हें प्रस्ताव बनाकर जिलाधिकारी (DM) को भेजना होगा और उनकी मंजूरी के बाद ही कार्य आगे बढ़ सकेगा। सरकार का यह कदम स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर को थामने और प्रधानों को अपने पाले में बनाए रखने की एक कोशिश मानी जा रही है।
पंचायत चुनावों में देरी का सबसे बड़ा तकनीकी और कानूनी कारण अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की प्रक्रिया का माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूले के पालन के लिए योगी कैबिनेट ने हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दी है।
निकाय चुनावों में ‘ट्रिपल टेस्ट’ वह नियम है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी बताया है। इसके तीन मुख्य चरण होते हैं।
योगी सरकार ने पहले चरण के तहत आयोग का गठन कर सर्वे का काम शुरू कर दिया है। आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद ही ट्रिपल टेस्ट के तीसरे चरण को लेकर फैसला किया जाएगा। अब क्योंकि जब तक यह कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया संपन्न होगी, तब तक साल 2026 समाप्त हो चुका होगा और प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनावों की दहलीज पर होगा। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पंचायत चुनाव करवापाना व्यावहारिक रूप से असंभव नजर आता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि योगी सरकार ने पंचायत चुनाव को टालने का फैसला सिर्फ कानूनी कारणों से नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे रणनीतिक कारण भी है। सरकार मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहती है।
योगी आदित्यनाथ सरकार के इस फैसले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर हमला बोला है। सपा ने कहा है कि सरकार अपनी खिसकती जमीन से डर गई है और ओबीसी आरक्षण के नाम पर केवल समय काट रही है। सपा का आरोप है कि भाजपा जनता का सामना करने से बच रही है।
वहीं, सरकार के सहयोगी दल, जैसे ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद, ने भी पहले ही संकेत दे दिए थे कि बिना पूर्ण तैयारी के चुनाव कराना मुश्किल होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि सत्ता पक्ष के भीतर चुनावों को टालने पर एक मौन सहमति थी। हालांकि, पंचायत चुनावों के टलने से उन हजारों उम्मीदवारों को गहरा झटका लगा है जो पिछले कई महीनों से तैयारी कर रहे थे।