समान कैडर में वेतन भेदभाव नहीं चलेगा; हाईकोर्ट ने खारिज की सरकार की अपील, कहा- अलग वेतनमान देना असंवैधानिक

Allahabad High Court: हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा कि एक ही कैडर में कार्यरत कर्मचारियों को अलग-अलग वेतनमान देना संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। कोर्ट ने यूपी सरकार की अपील खारिज कर कर दी।
Allahabad High Court Rules Different Pay Scales in Same Cadre Violate Equality Principle
इलाहाबाद हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Allahabad High Court Judgment: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि एक ही कैडर में कार्यरत कर्मचारियों को अलग-अलग वेतनमान देना संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है। कोर्ट ने पशुपालन विभाग में कार्यरत पशुधन प्रसार निरीक्षकों के वेतनमान से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा है।

वेतनमान और बकाया भुगतान का लाभ देने का निर्देश

न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने अपने निर्णय में वर्ष 2019 में एकलपीठ द्वारा दिए गए आदेश की पुष्टि की। एकलपीठ ने दो अप्रैल 1992 के शासनादेश को निरस्त करते हुए याची संतलाल सोनकर एवं अन्य कर्मचारियों को एक जनवरी 1986 से 1350-2200 रुपये का वेतनमान और बकाया भुगतान का लाभ देने का निर्देश दिया था।

दोनों पदों के कार्यों में कोई वास्तविक अंतर नहीं

मामला पशुपालन विभाग में पशुधन प्रसार अधिकारी और पशुधन प्रसार निरीक्षक (पूर्व में पशुधन विकास सहायक) के पदों के विलय से जुड़ा था। वर्ष 1986 से पहले दोनों पद अलग-अलग थे और उनके वेतनमान भी अलग थे, जबकि शैक्षणिक योग्यता और कार्य की प्रकृति लगभग समान थी।

कर्मचारियों की शिकायतों की जांच के बाद राज्य सरकार की ओर से गठित टास्क फोर्स समिति ने भी माना था कि दोनों पदों के कार्यों में कोई वास्तविक अंतर नहीं है। समिति ने वेतन विसंगति समाप्त करने की सिफारिश की थी। इसके बाद शासनादेश जारी कर दोनों पदों का विलय करते हुए 'पशुधन प्रसार अधिकारी' नाम से एक ही नहीं कैडर बनाया गया और सभी कर्मचारियों को 1200-2040 रुपये का संशोधित वेतनमान प्रदान किया गया।

हालांकि बाद में दो अप्रैल 1992 को जारी शासनादेश के जरिए केवल उन कर्मचारियों को 1350-2200 रुपये का उच्च वेतनमान दिया गया, जो एक जनवरी 1986 से पहले ही पशुधन प्रसार अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। राज्य सरकार ने इसे वरिष्ठ कर्मचारियों के वेतन संरक्षण और विसंगति दूर करने का उपाय बताया था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब दोनों पदों का विलय कर एक समान कैडर बना दिया गया, योग्यता और कार्य की प्रकृति भी समान रही, तब कर्मचारियों के बीच वेतनमान में भेदभाव करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि समान कैडर में अलग-अलग वेतनमान देना संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत है। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर कर्मचारियों को राहत बरकरार रखी।

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