हाईकोर्ट ने पलटा ट्रायल कोर्ट का फैसला, कहा- सिर्फ एक जैसे बयान से गवाह नहीं होते विश्वसनीय, 2 को किया बरी

Allahabad High Court:हाईकोर्ट ने बलिया के वेदप्रकाश सिंह हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए 2 दोषियों को बरी कर दिया। कहा कि केवल गवाहों के बयानों में समानता होना विश्वसनीयता का प्रमाण नही।
Allahabad High Court Acquits Two Convicts, Says Similar Witness Statements Alone Do Not Prove Credibility
इलाहाबाद हाईकोर्ट (सोर्स- फोटो नवभारत)
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Allahabad High Court Judgment: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल गवाहों के बयानों में एकरूपता होना उनकी गवाही की सत्यता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति ही संदेहास्पद हो तो ऐसी गवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बलिया के चर्चित वेदप्रकाश सिंह हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए दो दोषियों को बरी कर दिया।

धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह को आरोपों से किया मुक्त

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने वर्ष 2008 में हुए इस चर्चित मामले की सुनवाई करते हुए धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह को आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की कहानी और प्रस्तुत साक्ष्यों में कई गंभीर विसंगतियां हैं, जिनके कारण दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

बलिया में सड़क दुर्घटना के बाद हुआ था विवाद

मामले के अनुसार 13 मार्च 2008 को बलिया के रसड़ा थाना क्षेत्र में सड़क दुर्घटना के बाद विवाद हुआ था। आरोप था कि मुख्य अभियुक्त अंकुर सिंह उर्फ शेरू सिंह तथा अन्य लोगों ने बोलेरो वाहन से मोटरसाइकिल को टक्कर मारी, जिससे वेदप्रकाश सिंह की मृत्यु हो गई और अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस जांच में विवाद की वजह 25 हजार रुपये के लेन-देन को बताया गया था।

बचाव पक्ष का तर्क

ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2010 में एक आरोपी को बरी करते हुए अंकुर सिंह, यशवंत सिंह और धनुषधारी सिंह को दोषी ठहराया था। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कई कथित प्रत्यक्षदर्शियों को अभियोजन ने अदालत में पेश ही नहीं किया। साथ ही जिन गवाहों के बयान पेश किए गए, उनमें भी घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी को लेकर संदेह बना रहा।

गवाहों के बयान एक जैसे होने मात्र से उन्हें विश्वसनीय नहीं..

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि गवाहों के बयान एक जैसे होने मात्र से उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि एफआईआर में जिन दो गवाहों का नाम नहीं था, उनके बयान घटना के करीब आठ माह बाद दर्ज किए गए। इसके अलावा पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की गवाही से भी अभियोजन की कहानी को पूरा समर्थन नहीं मिला।

इलाहाबाद हाईकोर्ट  ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को विधि के विपरीत बताते हुए दोनों अपीलें स्वीकार कर लीं। साथ ही जमानत पर चल रहे दोनों आरोपियों के बांड निरस्त कर उन्हें मुकदमे की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। यह फैसला गवाहों की विश्वसनीयता और साक्ष्यों के मूल्यांकन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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