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योग से है गुरु गोरखनाथ का पुराना कनेक्शन, नाथ संप्रदाय ने ऐसे बनाया था जनसुलभ
21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देश-दुनिया में जोर शोर से इसकी तैयारियां भी शुरू हो चुकीं हैं। योग को लोक तक पहुंचाने में गुरु गोरखनाथ और नाथ संप्रदाय का महत्वपूर्ण योगदान है।
- Written By: आकाश मसने

योग करते लोग (सोर्स: सोशल मीडिया)
लखनऊ: 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देश-दुनिया में जोर शोर से इसकी तैयारियां भी शुरू हो चुकीं हैं। योग भारत की धरोहर है, इसीलिए यहां अधिक उत्साह होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि देश में कई जगह योग्य प्रशिक्षकों की देखरेख में साप्ताहिक आयोजन भी शुरू हो चुके हैं।
दुनिया के प्राचीनतम ग्रंथ वेद से लेकर उपनिषद, स्मृति, पुराण, रामायण, महाभारत समेत सभी धर्मग्रंथों में योग का उल्लेख है। अमूमन इसका दायरा गुफाओं, कंदराओं और अरण्यों में साधना, सिद्धि और मोक्ष तक ही सीमित था।
महर्षि पंतजलि ने योग की अपनी इस समृद्ध परंपरा को एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक स्वरूप दिया। जबकि गुरु गोरखनाथ ने योग के अंतर्निहित विशेषताओं को जन सामान्य के लिए सुलभ बनाकर इसे लोककल्याण का जरिया बनाया।
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गुरु गोरखनाथ और उनके बाद के नाथ योगियों, सिद्धों एवं साधकों ने शरीर को स्वस्थ, मन को स्थिर एवं आत्मा को परमात्मा में प्रतिष्ठित करने वाली इस विधा को लोक तक पहुंचाया। फिर तो योग जाति, धर्म, मजहब, लिंग और भौगोलिक सीमाओं से परे सबके लिए उपयोगी होता गया। आज पूरी दुनिया योग को इसी रूप में स्वीकार भी कर रही है।
उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना से जुड़े संप्रदायों में नाथपंथ का महत्वपूर्ण स्थान है। वृहत्तर भारत समेत देश के हर क्षेत्र में नाथ योगियों, सिद्धों, उनके मठों और मंदिरों की उपस्थिति इस पंथ की व्यापकता और प्रभाव का सबूत है।
क्या है नाथ संप्रदाय?
नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति आदिनाथ भगवान शिव से मानी जाती है। आदिनाथ शिव से मिले तत्वज्ञान को मत्स्येंद्रनाथ ने अपने शिष्य गोरक्षनाथ को दिया। माना जाता है की गुरु गोरक्षनाथ शिव के ही अवतार थे। गुरु गोरक्षनाथ का अपने समय में भारतवर्ष समेत एशिया के बड़े भूभाग (तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि) पर व्यापक प्रभाव था। उन्होंने अपने योग ज्ञान से इन सारी जगहों को कृतार्थ किया।
योग से लोकजीवन का उन्नयन : जॉर्ज गियर्सन
जॉर्ज गियर्सन के अनुसार गुरु गोरक्षनाथ ने लोकजीवन का परमार्थिक स्तर पर उत्तरोत्तर उन्नयन और समृद्धि प्रदान कर निष्पक्ष, आध्यात्मिक क्रांति का बीजारोपण कर योग रूपी कल्पतरु की शीतल छाया में त्रयताप से पीड़ित मानवता को सुरक्षित कर जो महनीयता प्राप्त की, वह उनकी अलौकिक सिद्धि का परिचायक है।
अपने समय में गोरक्षनाथ और उनके बाद नाथपंथ से जुड़े सिद्ध योगियों ने बताया कि योग गृहस्थ, संत, पुरुष, महिला सबके लिए समान रूप से उपयोगी है। इसमें अद्भुत शक्ति होती है। उम्र और क्षमता के अनुसार इसके थोड़े से अभ्यास से बड़ा लाभ संभव है।
मन को शांत और तन को निरोग रखने का इससे आसान, सुलभ और प्रभावी दूसरा कोई तरीका नहीं। योग से ही असंतुलीय ऊर्जा को संतुलित किया जा सकता। इस ऊर्जा के पूरी तरह संतुलित होना ही मुक्ति है। इस तरह मुक्ति की चाह रखने वालों के लिए भी इसकी राह योग ही निकालता है।
गोरक्षपीठ में योग का साप्ताहिक शिविर शुरू
विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी गोरक्षपीठ में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में योग के विभिन्न आसनों, ध्यान, प्राणायाम के अभ्यास का साप्ताहिक शिविर 15 जून से प्रारंभ हो चुका है। सुबह और शाम योगाभ्यास हो रहा है तो सुबह साढ़े दस बजे से बारह बजे तक योग, आयुर्वेद और राष्ट्रीयता से जुड़े विषयों पर विद्वतजन का। व्याख्यान हो रहा है।
गोरक्षपीठ में योग जारी है याेग शिविर (सोर्स: सोशल मीडिया)
सबके लिए खुला है गोरखनाथ जी का योग: एलपी टेशीटरी
एलपी टेशीटरी के मुताबिक गोरक्षनाथ जी के योग की खूबी इसकी सर्वजनीनता है। मसलन उनके योग का द्वार सबके लिए खुला है। ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ के मुताबिक योग साधना सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए हमारे ऋषियों, महर्षियों और महान योगियों द्वारा प्रचारित खास किस्म के रसायन हैं। इनका सेवन हर देश, काल, जाति, लिंग, वर्ण, समुदाय, संप्रदाय और पंथ के लोगों के लिए सुलभ और उपयोगी है। उनके मुताबिक अपनी इस परंपरा और सांस्कृतिक थाती को सुरक्षित एव समृद्ध करते हुए देश और समाज की सेवा लिए गोरक्षपीठ प्रतिबद्ध है।
इसी उद्देश्य से गुरु गोरक्षनाथ ने योग को लोककल्याण से जोड़ा। योग मानवता के कल्याण का जरिया बने। हर कोई इसकी उपयोगिता को जाने। इसके जरिये तन को स्वस्थ, मन को स्थिर करे, इसके लिए गुरु गोरखनाथ ने संस्कृत और लोकभाषा दोनों में साहित्य की रचना की।
गोरक्ष कल्प, गोरख संहिता, गोरक्ष शतक, गोरख गीता, गोरक्षशास्त्र, ज्ञानप्रकाश शतक, ज्ञानामृत योग, योग चिंतामणि, योग मार्तंड, योग सिद्धांत पद्धति, अमनस्क योग, श्रीनाथ सूत्र, सिद्ध सिद्धांत पद्धति, हठ योग संहिता जैसी रचनाएं इसका प्रमाण हैं।
योग की परंपरा को अहर्निश आगे बढ़ा रहा गोरक्षपीठ
गोरक्षपीठ योग की इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहा है। वहां महायोगी गुरु गोरक्षनाथ संस्थान द्वारा प्रशिक्षित योग गुरुओं के सानिध्य और निर्देशन में इच्छुक लोगों को योग के सैद्धांतिक और व्याहारिक पक्ष की जानकारी दी जाती है।
ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि समारोह और अब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भी यह सिलसिला चलता है। करीब हफ्ते भर चलने वाले पुण्यतिथि समारोह के दौरान देश के ज्वलंत मुद्दों पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के एक दिन का विषय योग ही होता है। यही नहीं संस्थान के प्रशिक्षु इसका जीवंत प्रदर्शन भी करते हैं।
सिर्फ अनुलोम विलोम ही नहीं इन प्राणायाम को डेली रूटीन का बनाएं हिस्सा, हेल्दी रहेगी आपकी सेहत
मौजूदा मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने ‘हठयोग, स्वरूप एव साधना’ नाम से खुद योग पर एक सारगर्भित किताब लिखी है। इसके अलग-अलग अध्यायों में योग, हठ योग, षटकर्म, आसन मुद्रा, प्रत्याहार, योग निद्रा, प्राणायाम, ध्यान, समाधि, नाद बिंदुसाधना और अजपा जप के बारे में उपयोगी जानकारी है।
भारतीय संस्कृति जितनी ही पुरानी है योग की परंपरा
योग उतना ही प्राचीन है, जितनी भारतीय संस्कृति। हमारे वेदों, उपनिषदों, पुराणों, गीता, रामायण, महाभारत, शिव संहिता, गोरक्ष संहिता, घेरण्ड संहिता, हठ योग प्रदीपिका, सिद्ध सिद्धांत और जैन, सांख्य वैशेषिक आदि दर्शनों में भी योग का जिक्र मिलता है। यहां तक कि दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में शुमार मोहनजोदड़ो एवं मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी पर बसे प्राचीन महिष्मति के पुरावशेषों में भी योग के प्रमाण मिलते हैं।
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