
बिल्डर अभय कुमार और मृतक इंजीनियर युवराज मेहता (सोर्स-सोशल मीडिया)
High Court Habeas Corpus Order: नोएडा के सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दुखद मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने इस मामले में गिरफ्तार एमजेड विजटाउन बिल्डर कंपनी के मालिक अभय कुमार की हैबियस कॉर्पस याचिका को स्वीकार करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नोएडा पुलिस ने गिरफ्तारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित अनिवार्य नियमों और प्रक्रियाओं का सही पालन नहीं किया। इस कानूनी आदेश के बाद आरोपी बिल्डर अभय कुमार को देर रात जेल से रिहा कर दिया गया है जिससे इस हाई-प्रोफाइल मामले में नया मोड़ आया है।
यह पूरा मामला सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दुखद मौत से जुड़ा हुआ है जिनकी कार सड़क किनारे पानी से भरे एक गहरे गड्ढे में गिर गई थी। पुलिस जांच के दौरान यह बात सामने आई कि निर्माणाधीन प्रोजेक्ट के पास सुरक्षा के लिए कोई भी खतरे का निशान या घेराबंदी नहीं की गई थी। इसी बड़ी लापरवाही के लिए विजटाउन प्लानर्स के निदेशकों को जिम्मेदार माना गया और डायरेक्टर अभय कुमार को 20 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था।
हफ्ते की शुरुआत में सोमवार को सीजेएम कोर्ट ने एमजेड विजटाउन के डायरेक्टर अभय कुमार को जमानत देने से पूरी तरह से इनकार कर दिया था। अदालत ने बिल्डर की न्यायिक हिरासत को 10 दिनों के लिए बढ़ा दिया था और इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 फरवरी तय की थी। निचली अदालत से राहत न मिलने के बाद कुमार के वकीलों ने हार नहीं मानी और इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पाया कि नोएडा पुलिस ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के तय दिशा-निर्देशों की भारी अनदेखी की है। न्यायालय ने अभय कुमार की याचिका को मंजूर कर लिया और पुलिस हिरासत को गैर-कानूनी मानते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से जेल से छोड़ने का आदेश दिया। अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब इस मामले में गिरफ्तार किए गए तीनों लोग जेल की सलाखों से पूरी तरह से बाहर आ चुके हैं।
इससे पहले लोटस बिल्डर के दो अन्य कर्मचारियों को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया था जिन्हें सीजेएम कोर्ट ने सुनवाई के बाद पहले ही रिहा कर दिया था। अभय कुमार की रिहाई के साथ ही अब नोएडा पुलिस की कार्यप्रणाली और गिरफ्तारी के तरीकों पर कई गंभीर कानूनी सवाल खड़े होने लगे हैं। पुलिस ने आरोपियों पर लापरवाही के कारण गैर इरादतन हत्या और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर कड़ी कार्रवाई शुरू की थी।
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यह घटना नोएडा में चल रहे विभिन्न निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और बिल्डरों की बड़ी लापरवाही की ओर साफ तौर पर इशारा करती है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस पर अब यह दबाव बढ़ गया है कि वे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े सुरक्षा नियम लागू करवाएं। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक आरोपी की रिहाई है बल्कि यह पुलिस के लिए कानूनी प्रक्रियाओं के सही पालन की एक बड़ी सीख भी है।






