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घोषणा पत्रों पर भरोसा करें या नहीं
- Written By: चंद्रमोहन द्विवेदी

हर पार्टी अपना चुनावी घोषणा पत्र (Election Manifesto) जारी करती है ताकि मतदाता उसे पढ़ें और उसमें किए गए वादों पर विश्वास कर उसे वोट दें। जो निष्ठावान या कमिटेड वोटर रहता है उसे घोषणा पत्र पढ़ने की जरूरत ही नहीं रहती। वह हमेशा अपनी पसंद की पार्टी को वोट देता है। इसमें कोई तर्क-वितर्क नहीं करता। पार्टी भी अपने परंपरागत वोटरों को पहचानती है। घोषणा पत्र उन मतदाताओं के लिए रहता है जिनकी च्वाइस तय नहीं होती और मन चल-विचल रहता है। ऐसे वोटर को गारंटी देकर पटाया जाता है। ऐसे मतदाता देखते ही किसकी गारंटी फायदेवाली या आकर्षक है।
हर लुभावना वादा पूरा नहीं होता लेकिन फिर भी उम्मीद तो जगाता है। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे पर चुनाव जीता था लेकिन जनता वैसी ही गरीब रही, नेता अमीर होते चले गए! बीजेपी ने 2014 के चुनाव में किसानों को उत्पादन लागत के आधार पर फसल का गारंटी भाव देने का वादा किया था जो पूरा नहीं हुआ। घोषणा पत्र में वादों की भरमार रहती है। सत्ता पक्ष अपने वादों को जनकल्याणकारी संकल्प पत्र और विपक्षी पार्टियों के वादों को ‘रेवडी’ बताता है। शिवसेना ने अपने घोषणा पत्र को ‘वचननामा’ नाम दिया है।
लोकतंत्र में उम्मीद की जाती है मतदाताओं को विभिन्न पार्टियों के घोषणा पत्र पढ़ना चाहिए लेकिन पढ़े-लिखे लोग भी या तो इन्हें पढ़ते नहीं या सरसरी नजर डालकर छोड़ देते है। सुप्रीम कोर्ट ने भी मुफ्त में बहुत कुछ देनेवाले आश्वासनों पर सवाल उठाया था।
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अब तो वादे या आश्वासन सिर्फ 5 वर्ष तक के लिए सीमित नहीं रहते। जनता को आज से 23 वर्ष बाद अर्थात 2047 तक के लिए वादे किए जाने लगे हैं क्योंकि वह देश की आजादी को शताब्दी वर्ष होता। फाइबर ग्लास की शीट से झोपड़ा बस्तियां ढक देनेवाले देश को कुछ ही वर्षों में तीसरे नंबर की वर्ल्ड इकोनॉमी बनाने का वादा करते हैं। साथ ही करोड़ों गरीबों को 5 वर्ष तक मुफ्त राशन देने का भी समानांतर वादा किया जाता है। किसी को इसमें विरोधाभास नहीं देखना चाहिए।
Trust election manifestos or not
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