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लड्डू में मिलावाट का मामला, चंद्रबाबू नायडू को सुप्रीम कोर्ट की लताड़
धर्म व आस्था के मुद्दों से राजनीति को अलग रखना चाहिये और प्रथमदृष्ट्या यह साबित करने को कुछ नहीं है कि तिरुमाला तिरुपति मंदिर में लड्डू तैयार करने के लिए मिलावटी धी का प्रयोग किया गया था। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू को अच्छी खासी लताड़ लगाई कि उन्होंने बिना किसी आधार के सार्वजनिक आरोप लगाया कि प्रसादम में मिलावट की गई और करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया।
- Written By: मृणाल पाठक

(डिजाइन फोटो)
धर्म व आस्था के मुद्दों से राजनीति को अलग रखना चाहिये और प्रथमदृष्ट्या यह साबित करने को कुछ नहीं है कि तिरुमाला तिरुपति मंदिर में लड्डू तैयार करने के लिए मिलावटी धी का प्रयोग किया गया था। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू को अच्छी खासी लताड़ लगाई कि उन्होंने बिना किसी आधार के सार्वजनिक आरोप लगाया कि प्रसादम में मिलावट की गई और करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया।
पांच याचिकाओं, जिनमें से एक सुब्रमण्यम स्वामी की थी। पर संयुक्त सुनवाई करते हुए न्यायाधीश बीआर गवई व न्यायाधीश केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने कहा कि प्रसादम को टेस्ट के लिए नहीं भेजा गया था और टीटीडी से बार-बार इस बात के साक्ष्य मांगे गए कि लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी प्रयोग किया गया था।
अदालत ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार रिजेक्ट किए गए धी का एक सैंपल टेस्ट किया गया था अदालत ने सुनवाई के शुरू में ही कहा, ‘लैब रिपोर्ट में कुछ डिसक्लेमर हैं, यह एकदम स्पष्ट नहीं है। यह कहती है कि रिजेक्ट किए गए घी को टेस्ट किया गया था। रिपोर्ट जुलाई में आई थी और बयान सितम्बर में दिया गया। रिपोर्ट कहती है कि जिस मटेरियल को टेस्ट किया गया, वह प्रसादम बनाने के लिए प्रयोग नहीं किया गया था।’
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से तो ऐसा प्रतीत होता है कि नायडू ने बिना बात का बतंगड़ बनाया है। लेकिन क्यों? नायडू मंझे हुए राजनीतिज्ञ हैं। वह अकारण या केवल सनसनी फैलाने के लिए कोई बयान नहीं दे सकते। ऐसा लगता है कि यह बयान जम्मू-कश्मीर व हरियाणा चुनाव में जो खेती-किसानी, बेरोजगारी, अग्निवीर आदि के ज्वलंत मुद्दे थे, उनसे ध्यान भटकाने के लिए दिया था ताकि नया भावनात्मक मुद्दा एक राजनीतिक दल को चुनावी लाभ पहुंचा सके।
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कोर्ट ने आंध्र प्रदेश की राज्य सरकार और टीटीडी से मालूम किया कि वह इस निष्कर्ष पर किस तरह से पहुंचे कि प्रसादम बनाने के लिए मिलावटी घी का प्रयोग किया गया था। अदालत ने कहा कि जब प्रसादम में मिलावट के कोई साक्ष्य मौजूद नहीं थे तो मुख्यमंत्री के लिए बयान देने का क्या औचित्य था और वह भी एफआईआर दर्ज करने व एसआईटी गठित करने से पहले।
अब अदालत 3 अक्टूबर को यह तय करेगी कि राज्य द्वारा गठित एसआईटी की जगह जांच स्वतंत्र एजेंसी को दी जाये या नहीं और इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सहयोग मांगा है। खंडपीठ ने कहा, ‘जब अपने एसआईटी के जरिये जांच के आदेश दिए है तो प्रेस के पास जाने की क्या आवश्यकता थी।
आप एक संवैधानिक पद पर हैं, आपको थोड़ा संयम तो रखना चाहिए था। हम उम्मीद करते हैं कि देवताओं को राजनीति से अलग रखा जाये। सुप्रीम कोर्ट के सवालों से स्पष्ट हो गया है कि यह केस नायडू के 19 सितंबर के शुरुआती बयान से बहुत दूर निकल गया है। नायडू ने आरोप लगाया था कि प्रसादम के लड्डू मिलावटी पाये गए हैं। टेस्ट के लिए लड्डु नहीं बल्कि घी भेजा था जिसकी गुणवत्ता की जांच सप्लाई डिलीवरी के समय की जाती है।
यह टेस्ट मंदिर प्रशासन की मानक संचालन प्रक्रिया के तहत ही कराये जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह स्पष्ट हो गया है कि तथाकथित मिलावटी घी लड्डू बनाने के लिए कभी प्रयोग किया ही नहीं गया था। यह तथ्य दुनियाभर के श्रद्धालुओं का विश्वास लौटाने के संदर्भ में पहला कदम है। तिरुपति लड्डू पोस्टल स्टाम्प हैं, जीआई मार्क और पेटेंट भी।
इन आरोपों के चलते यह मांग भी उठी है कि सरकारें मंदिरों को नियंत्रित करना छोड़ दें। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में भी मंदिरों को निजी नियंत्रण में देने की मांग करने वाली याचिका को यह कहते हुए कि ‘समय के पहिये को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता’, स्वीकार करने से इंकार कर दिया था।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
Supreme court reprimands chandrababu naidu over tirupati balaji temple laddu controversy
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