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नवभारत विशेष: सुरक्षा की कमजोर कड़ी है घुसपैठ का मुद्दा
- Written By: अंकिता पटेल
West Bengal Election: बंगाल चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने घुसपैठ का मुद्दा फिर उठाया है। डेमोग्राफी मिशन की घोषणा के बावजूद ठोस कार्ययोजना और रिपोर्टिंग तंत्र अब भी अस्पष्ट है।

प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )
नवभारत डिजिटल डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते बरस भी 15 अगस्त को लाल किले से भारत में मौजूद घुसपैठियों का जिक्र किया था, फिर उसी महीने और अगले महीने यही बात उन्होंने बिहार चुनावों में भी दोहराई थी। अब बंगाल चुनावों से पहले उनकी यह चिंता चरम पर दिखती है। प्रधानमंत्री ही नहीं गृहमंत्री ने भी कई बार इस आशय के बयान दिये हैं कि वे घुसपैठियों को अब चुन-चुनकर देश के बाहर निकालने वाले हैं।
प्रधानमंत्री ने छह महीने पहले घुसपैठियों की समस्या से निबटने के लिये डेमोग्राफी मिशन शुरू करने की बात कही और घोषणा की थी कि बहुत जल्द वे मिशन अपना काम शुरू करेगा। इस मिशन के समयबद्ध लक्ष्य, बजट, जिम्मेदार एजेंसियां और सार्वजनिक रिपोर्टिंग तंत्र तथा क्रियान्वयन को लेकर स्थिति अस्पष्ट है।
घुसपैठिए सरकारी योजनाओं और राजनीतिक संरक्षण का लगातार अनुचित लाभ उठाते जा रहे हैं, जिससे सरकार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। सामाजिक तनाव और अपराधों में वृद्धि हो रही है। कृषि, निर्माण और घरेलू मजदूरी के क्षेत्रों में घुसपैठियों के सस्ते श्रमिक चन जाने से स्थानीय मजदूरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ता है।
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घुसपैठिए वोटर आईडी और आधार कार्ड जैसे फर्जी दस्तावेज बनाकर चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर लोकतंत्र को प्रदुषित कर ही रहे ही हैं, इसके अतिरिक्त वे सीमावर्ती राज्यों में नकली करेंसी, नशीली दवाओं, गायों की तस्करी और आतंकवादियों के स्लीपर सेल बनने का माध्यम भी बन रहे हैं।
घुसपैठ से सबसे ज्यादा प्रभावित बंगाल, असम और बिहार में भाजपा इस मुद्दे को लगातार उठा रही है पर दुखद तथ्य है कि घुसपैठ और अवैध प्रवासियों की समस्या पर अब तक भय और भाषण से अधिक कुछ हासिल नहीं हुआ है।
क्या घुसपैठियों को वापस भेजा जा सकेगा
अवैध घुसपैठियों का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। प्रधानमंत्री अपनी चुनावी सभाओं में लगातार घुसपैठियों तथा अवैध अप्रवासियों से मुक्त भारत की बात कर रहे हैं। वे इस समस्या को कानून-व्यवस्था का ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन का प्रश्न भी मानते हैं।
विगत सरकारों को दोष देने और हर बार चुनावों में इस मुद्दे को उठाने, कुछ घोषणाओं और आधे अधूरे प्रयासों के अलावा कोई ठोस समाधान अभी तक सामने नहीं आया है।
क्या इस बार वाकई सरकार गंभीर है और कम से कम बांग्लादेशी और म्यांमार के घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिये कटिबद्ध है? बंगाल के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और किरेन रिजिजू के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ मुसलमान बांग्लादेशी घुसपैठिए मौजूद हैं जिसमें से एक करोड़ बंगाल में हैं।
सरकार मानती है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों और अवैध अप्रवासियों की तादाद भी लगातार बढ़ती जा रही है ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि जब घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी मात्र राज्यों की नहीं है, इसके प्रति गृह मंत्रालय, सीमा सुरक्षा बल, विदेश मंत्रालय और पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंध सबकी साझा जवाबदेही है तब क्यों न यह उसकी विफलता मानी जाए।
यह भा पढ़ें:-निशानेबाज: निशान लगाओ लाल या भगवा मुफ्तखोरी की नहीं कोई दवा
हम अमेरिका की तरह अवैध प्रवासियों को चुन चुनकर वापस भेजने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं जब उसकी तरह निर्वासन की कोई स्थायी और तेज प्रक्रिया, स्पष्ट आवजन कानून, एकीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस डेटाबेस और पड़ोसी देशों के साथ निर्वासन को लेकर स्पष्ट संधियां एवं कार्यात्मक समझौते ही नहीं हैं।
बेशक सरकार के लिये प्रतिबद्धता साबित करने का यही समय है पर सच यह है कि समाधान भाषणों या भय के नैरेटिव में नहीं है। सरकार सचमुच प्रतिबद्धता दिखाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले उसे पारदर्शी, अद्यतन और सर्वमान्य आंकड़े सार्वजनिक करने होंगे।
समयबद्ध कार्ययोजना, अंतर-मंत्रालयी समन्वय, सीमाई प्रबंधन की मजबूती और सख्त कार्रवाई के ठोस कदम उठाने होंगे, तभी ‘घुसपैठ मुक्त भारत’ साकार होगा।
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा
Modi infiltration bengal election demography mission
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